चातिक चुहल चहुँ ओर चाहै स्वाति
Sujan Hita — श्री घनानंद
Verse 2 of 3
(कवित्त)
एक आस एकै बिसवास प्रान गहैं बास,
और पहचानि इन्हैं रही काहू सौं न है। [1]
चातिक लौं चाहै ‘घनआनँद’ तिहारी ओर,
आठौं जाम नाम लै, बिसारि दीनी मौन है॥ [2]
जीवन-अधार जान सुनियै पुकार नेकु,
अनाकानी दैबो दैया घाय कैसो लौन है। [3]
नेह-निधि-प्यारे गुन-भारे ह्वै न रूखे हूजै,
ऐसो तुम करौ तौ बिचारन कौं कौन है॥ [4]
- श्री घनानंद जी, घनानंद ग्रंथावली, सुजान हित (260)
(कविता) एक ही विश्वास, जीवन का दीपक, और पहचानना कि इतने सारे क्यों हैं। [1] चटिक लौं चहै 'घनानंद' तिहारी या, आठों जम नाम लै, बिसरी दीनी मौन है.. [2] जीवन-अधार जन सुनियै पुकार नेकु, अंकनि दइबो दईया घय कैसो लौं है। [3] नेहा-निधि-प्यारे गुणों से भरपूर, मैं असभ्य नहीं, ऐसे करोगे तो कौन रूठेगा.. [4] - श्री घनानंद जी, घनानंद ग्रंथावली, सुजन हित (260)