चातिक चुहल चहुँ ओर चाहै स्वाति
Sujan Hita — श्री घनानंद
Verse 3 of 3
लगी है लगनि प्यारे पगी है सुरति तोसों,
जगी है बिकलताई ठगी सी सदा रहौं। [1]
जियरा उड्यौ सो डोलै हियरा धक्यौई करै,
पियराई छाई तन, सियराई दौ दहौं॥ [2]
ऊनो भयौ जीबो अब सूनो सब जग दीसैं,
दूनो दूनो दुख एक एक छिन मैं सहौं। [3]
तेरे तौ न लेखो, मोहिं मारत परेखो महा,
जान घनआनंद पै खोयबो लहा लहौं॥ [4]
- श्री घनानंद जी, घनानंद ग्रंथावली, सुजान हित (242)
मुझे इसका एहसास करना है, प्रिय, सुरति खुश है, मैं हमेशा थका हुआ हूं। [1]. [3].