धन-धन वृन्दावन यह नाउं
Van Jan Prashnsa —
Verse 1 of 5
धन - धन वृन्दावन यह नाउं।
सब तत्त्वनि को सार-सार सुख परम पियारो ठाउं॥ [1]
सोवत सुपनै नित निसबासुर, याही को नित गाउं।
नागरिया जाकैं मुख प्रगटैं ता मुख की बलि जाउं॥ [2]
- श्री नागरीदास जी (महाराज सावंत सिंह जी), वन जन प्रशंसा (4)
धन-धन वृन्दावन यः नौं। सुख से तुमने सब तत्वों को प्यार किया.. [1] नित स्वप्न देखूँ, सदा यही गाऊँ। नगरिया जकैन मुख प्रगटैं ता मुख की बाली जौं.. [2] - श्री नागरीदास जी (महाराज सावंत सिंह जी), एक सार्वजनिक प्रश्न (4)