कुंज महल रंग हो हो होरी
Varshotsava — श्री वंशी अलि
Verse 1 of 3
हिंडोरैं झूलत राधा प्यारी।
गोरे मुष पहिरै कुसुंभी सारी॥ [1]
फूली साँझ जुत चंद बिराजत।
बादर रेष सी केस-पास तामैं रवि की किरनि किनारी॥ [2]
ताही ढिंग मानौं उदय उडगन होत ऐसैं ताटंक विदुली सँवारी।
छवि निरषत वंशीअलि रीझि रही देत प्रान-धन वारी॥ [3]
- श्री वंशी अली जी, वर्षोत्सव, हिंडोला (6)
पिछवाड़े पर झूलती प्यारी राधा। संपूर्ण सुंदरी ने श्वेत वस्त्र धारण कर रखा है.. [1] संध्या के समय कुछ लोग बैठे हुए हैं। स्नानेर रेश सी-निकत तमन रवि किराना किनारा कैसा है.. [2] ताहि धिंग मनौं उदय उदयन होत अइसैन ततंक विदुली सावरी। छवि: निराश वंशी अली रेझि रहि देत प्राण-धन वारी.. [3] - श्री वंशी अली जी, वर्षोत्सव, हिंडोला (6)