त्वदलोकन-कालाहि
Vilap Kusumanjali — श्री रघुनाथ दास गोस्वामी
Verse 3 of 12
हा नाथ गोकुलसुधाकर सुप्रसन्न वक्त्रारविन्द मधुरस्मित हे कृपारद्।
यत्र त्वया विहरते प्रणयैः प्रियाऽऽरा त्तत्रैव मामपि नय प्रियसेवनाय॥
- श्री रघुनाथ दास, विलाप कुसुमांजलि (100)
हा नाथ गोकुलसुधाकर, प्रसन्न वक्ता, मधुर मुस्कुराने वाले, हे धन्य! यत्र त्वया विहारते प्रणयै: प्रियैर तत्रैव ममपि नै प्रियसेवनाय। - श्री रघुनाथ दास, विलाप कुसुमांजलि (100)