त्वदलोकन-कालाहि

Vilap Kusumanjali — श्री रघुनाथ दास गोस्वामी

Verse 5 of 12

जित्वा पाशकखेलायामाच्छिद्य मुरलीं हरेः। क्षिप्तां मयि त्वया देवि गोपयिष्यामि तां कदा?॥ - श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (80) जित्वा पाशाखेलायमाच्छिद्या मुरलिन हरे: क्षिप्तं मयि त्वया देवी गोपयिष्यामि तं कदा?.. - श्रीरघुनाथ दास गोस्वामी, विलाप कुसुमांजलि (80)
त्वदलोकन-कालाहित्वदलोकन-कालाहि