अहो रसिक सुकुमारी करौ विनती कर जोरि

Vinay Kundaliyan — श्री अलबेली अलि

Verse 11 of 11

श्री राधा विवि चरण वर करत उचारि-उचारि। क्वास, क्वास, हा स्वामिनी, दीरघ स्वास उसारि॥ [1] दीरघ स्वास उसारि फिरत वन वन में रानौं। बह्यौ नैंन जल धार हियौ अति ही अकुलानौं॥ [2] बूडयौ महा दुःख-सिन्धु गहौ कर आनि नवेली। लीजै कंठ लगाय चितै हंसि मोहि अलबेली॥ [3] - श्री अलबेली अलि, विनय कुंडलियाँ (12) श्रीराधा विश्वविद्यालय की सीढ़ियाँ ऊपर-नीचे घूमती रहीं। क्वास, क्वास, हा स्वामिनी, लंबी सांस उसरी.. [1] लंबी सांस उसरी, फिरत वान वान मैं राणौं। आँखों में पानी भर आता है, तुम बड़े भोले हो.. [2] बुदायौ महादुःख - सिन्धु गेहूँ है, नवजात है। लीजै कंठ लागे चितै हांसी मोहि अलबेली.. [3] - श्री अलबेली अली, विनय कुंडलिया (12)
अहो रसिक सुकुमारी करौ विनती कर जोरि