सुनहु रसिक श्रीवृन्दावन को जस
Vitthal Vipul Vani — श्री विट्ठल विपुल देव
Verse 13 of 19
(राग बिलावल)
सुनहु रसिक श्रीवृन्दावन को जस। [1]
कुञ्ज केलि मानिनी मनोहर
परबस भये नाँहिने अपने बस॥ [2]
इहि बन नित्य नवीन युगल वर
द्रुम दल दिव्य श्रवण सलिता लस। [3]
श्री विट्ठल विपुल विनोद बिहारी कौ
पानि कियौ चाहत रसना रस॥ [4]
- श्री विठ्ठल विपुल देव जी, श्री विठ्ठल विपुल देव जू की वाणी (13)
(राग बिलावल) सुनहु रसिक श्री वृन्दावन को जस। [1] कुंज केलि मानिनी मनोहर परबास भये नन्हीं अपना बस... [2] नव दम्पति वर-वधु दिव्य श्रवण सलिता लास की यही नीति है। [3] श्री विट्ठल विपुल विनोद बिहारी कौन पानी कियौ चाहत रसना रस.. [4] - श्री विट्ठल विपुल देव जी, श्री विट्ठल विपुल देव जू की वाणी (13)