त्रिषणमिह भवदंघ्रिप्रणतिः
Vitthalnath Stotras — श्री विट्ठलनाथ (गुसाईं जी)
Verse 15 of 18
भवतीनां प्रियसङ्गम संजात मनो महोत्सवेक्षणतः।
तर्पण मिह सर्वेन्द्रियतृप्ति भावितान्मनोरथाप्त्यामे॥
- श्री विट्ठलनाथ जी (गुसाईं जी), श्री स्वामीनीजी प्रार्थना (5)
भवतिनाम प्रियसंगम स्नजत् मनो महोत्सवेक्षनाथ। तर्पण मिह सर्वेन्द्रिय ग्रैति भवितान्मनोरथप्यमे। - श्री विट्ठलनाथ जी (गुसाईं जी), श्री स्वामिनीजी प्रार्थना (5)