त्रिषणमिह भवदंघ्रिप्रणतिः
Vitthalnath Stotras — श्री विट्ठलनाथ (गुसाईं जी)
Verse 14 of 18
अस्तंगच्छत्सूर्या शुशुक्षणौ दिवसदु:ख होमोऽस्तु।
त्वत्पृष्ट प्रिय वार्ता कनिं मे ब्रह्म यज्ञोस्तु॥
- श्री विट्ठलनाथ जी, श्री स्वामीनीजी प्रार्थना (4)
अष्टांगचचत्सुर्य शुशुक्षणौ दिवासूक्ष होमोस्तु। त्वपज्ञा प्रिय वार्ता कैनिन मे ब्रह्म यज्ञोस्तु.. - श्री विट्ठलनाथ जी, श्री स्वामिनीजी प्रार्थना (4)