आय कुँवर ठाड़े भये नवल कुंवरि के संग
Vnshivat Madhuri — श्री माधुरी दास
Verse 2 of 12
(कवित्त)
बार बार रीझि रीझि कहत विहारीलाल
देखिये निहारी प्रिये शोभा वंशीबट की। [1]
झलकत जल में झलकि नाना भांतिन की
झूमि झूमि डारे सब धरनि सों लटकी॥ [2]
चहुँ ओर नाचत चकोर मोर रस भरे
सारसनि लागी जक तुब नाम रटकी। [3]
इन सौ हितू न मोकूँ कोऊ और लागत है
कहिये कहां लों कौंन जाने मेरे घट की॥ [4]
- श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (287)
(कविता) रीझी रीझी बार-बार कहती है विहारीलाल देखो निहारी प्रिय शोभा वंशीबाट की। [1] नाना भाटिन के झूले जल में झलके, धरती के सारे पुत्र घबरा गए लताकि.. [2] नाचता मोर, चाहे न चाहे, देने लगा रसदार ध्वनि, टब का नाम है रतकी। [3] ये सौ फ़ायदे मोल नहीं और लगता है, कर्ज़ कहाँ है, मेरा घाट क्या जाने.. [4] - श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (287)