यदैव सच्चिद्रसरूप

Vrindavan Mahimamrita — श्री प्रबोधानन्द सरस्वती

Verse 105 of 124

त्वयि रचयति राधिकाऽवनाशा मतिभय मेत्य पलायितव माया। हतहृदय कुतोन्विदं तवागाद् विकृतिशतं गगन प्रसून कल्पम्॥ - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (14.41) त्वय रचनायति राधावनाशा मतिभय मेत्य पलयित्व मया। हठर्दया कुतोन्विदं तवगद् विकृतशतशं गर्गं प्रसून कल्पम्। - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (14.41)
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