यदैव सच्चिद्रसरूप

Vrindavan Mahimamrita — श्री प्रबोधानन्द सरस्वती

Verse 117 of 124

आनंदकन्देऽपि न विंदते मनो वृन्दावने सुंदरि सौख्य बिंदुकम्। मनागवीक्ष्य स्मितचारु ते मुखं विना क्व चंद्र कुमुदं मुदं व्रजेत्॥ - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (11.110) आनन्दकाण्डेपि न विन्दते मनो वृन्दावन सुन्दरी सौख्य बिन्दुकम्। मंगवीक्ष्य स्मिताचारु ते मुख विना क्व चन्द्र कुमुदं मुदं व्रजेत्। - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (11.110)
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