यदैव सच्चिद्रसरूप

Vrindavan Mahimamrita — श्री प्रबोधानन्द सरस्वती

Verse 118 of 124

वृन्दावन इह कति वा न मिलन्ति विदग्ध गोपसुंदर्यः। राधे त्वयि परमक्षि क्व चकोरश्चरति चन्द्रिका-परतः॥ - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (11.111) वृन्दावन इह कटि वा न मिलन्ति विदग्धा गोपसुन्दरयः। राधे त्वयि परमाक्षि क्व चकोरश्चरति चन्द्रिका-परथ। - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (11.111)
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