यदैव सच्चिद्रसरूप

Vrindavan Mahimamrita — श्री प्रबोधानन्द सरस्वती

Verse 20 of 124

वृन्दाटवी नहि कवीश्वरकाव्यकोटि-, सम्भाव्यमानगुणरत्नगणच्छटैका। एतामपाररसखानिमशेषखानि, संरुध्य मित्रमतिमध्यवसीय याहि॥ - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.35) वृंदातवि नहि कविश्वरकाव्यकोटि-, संभव्यमंगुनारत्नगणच्चतैका। एतामापारसखानिम्शेषखानि, सृद्धि मित्रमतिमध्यवासिय यः। - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.35)
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