यदैव सच्चिद्रसरूप

Vrindavan Mahimamrita — श्री प्रबोधानन्द सरस्वती

Verse 24 of 124

वृन्दाटवी विमिलचिद्घन-सत्त्ववृन्दा वृन्दारक प्रवरवृन्द-मुनीन्द्र-वन्द्या। निन्द्यानपि स्वकृपयाऽद्भुतवैभवेन मादृक्पशून् स्वचरणानुचरीकरोतु॥ - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.44) वृन्दत्वि विमिलाचिघ्न-सत्त्ववृन्द वृन्दारक प्रवरवृन्द-मुनिन्द्र-वन्द्या। निंदायनपि स्वकृपायद्भूतवैभावेन माद्रिकापासं स्वचरणानुचरिकरोतु। - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.44)
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