यदैव सच्चिद्रसरूप
Vrindavan Mahimamrita — श्री प्रबोधानन्द सरस्वती
Verse 23 of 124
जहि विषय दुर्विषवनं छिन्दि दुराशा महा पाशान।
अयि मति विहंगि याया अमृतं वृन्दावन समुड्डीय॥
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (14.3)
जहां विषय विष से भरा होता है, वहां एक बड़ी पथरी होती है। आई मति विहंगी यया अमृतं वृन्दावन समुद्दिया.. - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (14.3)