कहाँ हौं वृंदावन तजि जाउँ

Vyas Vani — श्री हरिराम व्यास

Verse 106 of 139

(राग सारंग) अब न और कछू करने, रहनै है वृन्दावन। हौनौ होइ सो होइ किनि, दिन-दिन आयु घटति झूठे तन॥ मिलिहैं हित ललितादिक दासी, रास में गावत सुनि मन। जमुना-पुलिन-कुञ्ज, बन-बीथिनि, बिहरत गौर-स्याम-घन॥ कहा सुत-सम्पति-गृह-दारा, कतहु हरि माया के फंदन। ‘व्यास’ आस छाँड़हु सब ही की, कृपा करी राधा-नंदनदन॥ - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार), व्यास वाणी, पूर्वार्ध (106) (राग सारंग) अब और कुछ मत करो, तुम्हें वृन्दावन में ही रहना है। जो हो गया सो हो गया, आयु दिन-प्रतिदिन घटती जा रही है, शरीर मिथ्या है... मुझे ललितादिक दासी का सार मिल गया है, मेरा मन सार में गीत सुनता है। जमुना-पुलिना-कुंजी, बाना-बिथिनी, बिहारत गौरा-स्याम-घन.. कह सुता-संपति-गृह-दारा, कथू हरि माया के प्रेमी। 'व्यास' चंढू सबके लिए, कृपा करो राधा-नंदन.. - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार), व्यास वाणी, पूर्वार्द्ध (106)
खरौ-खरौ सब लेत हैं परखि पारखू सारऐसो कब करिहौ मन मेरौ