खरौ-खरौ सब लेत हैं परखि पारखू सार
Vyas Vani — श्री हरिराम व्यास
Verse 108 of 139
दुविधा तब जैहै या मन की।
निर्भय ह्वै कैं जब सेवहुगे रज श्रीवृन्दावन की॥
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (224)
दुविधा यह है कि आत्मा की या मन की। श्रीवृन्दावन के राज्य की सेवा करते हुए कोई निर्भय कैसे हो सकता है? - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, प्रथम भाग (224)