झूलत फूलत कुंजविहारी

Vyas Vani — श्री हरिराम व्यास

Verse 118 of 139

(राग मलार) मान न कीजै मानिनि वरषा ऋतु आई। अंग संग मिलि गाउ राधिका, राग-मलार सुहाई॥ [1] बिनु अपराधहि रूसनौं छाँड़िदै श्रीवृषभान दुहाई। व्यासस्वामिनी साँवरे-सुंदर, पाँइनि लागि मनाई॥ [2] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्द्ध (188) (राग मलारा) मन न किजै मानिनी वर्षा ऋतु। गौ राधिका तन में समाई, प्रेम मधुर... [1] बिना किसी अपराध के भगवान वृषभ से चंडीदाई का जाप करने की प्रार्थना करें। व्यास स्वामिनी सुन्दर है, पाणिनि लागी मनई.. [2] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्द्ध (188)
खरौ-खरौ सब लेत हैं परखि पारखू सारकहाँ हौं वृंदावन तजि जाउँ