कहाँ हौं वृंदावन तजि जाउँ

Vyas Vani — श्री हरिराम व्यास

Verse 119 of 139

(राग सारंग, जयति ताल) मन तू वृंदावन के मारग लागि। तेरौ न कोऊ न तू काहूकौ, माया मोह तजि भागि॥ [1] यह कलिकाल व्याल विष भोयौ, जग सोयौ तू जागि। भवसागर हरि वोहितकौ तू, होहि कृपाकरि कागि॥ [2] गो गिरि सर सलिता द्रुम कुंजनि, सौं औरहि अनुरागि। व्यास आस करि राधा-धव की, ब्रजवासिन के कौरा माँगि॥ [3] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (92) (राग सारंग, जयति ताल) मन, वृन्दावन पथ पर चलो। न मैं तेरे लिए रोया, न तू कुछ बोला, भाग माया से। [1] इस कलिकाल के विष से डरो, सोते जगत को जगाओ। भवसागर हरि वोहितकौ तू, होहि कृपाकारी कागजी.. [2] गो गिरि सर सलिता द्रुम कुंजनि, सौं अंधी अनुरागी। व्यास ने राधा-धा से ऐसा किया, माँगा ब्रजवासिन का कौर.. [3] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (92)
झूलत फूलत कुंजविहारीखरौ-खरौ सब लेत हैं परखि पारखू सार