खरौ-खरौ सब लेत हैं परखि पारखू सार

Vyas Vani — श्री हरिराम व्यास

Verse 133 of 139

वृन्दाबन साँचौ धन भैया। कनक कूट कौटिक लगि तजिए, भजिये कुँवर कन्हैयाँ॥ [1] जहाँ श्री राधा चरनरेनु की कमला लेत बलैय्या। तिन को गोपी नाच नचावत, मोहन वेणु बजैया॥ [2] कामधेनु के छीर सिन्धु तजि भजहु नन्द की गैय्या। चार्यों मुक्ती कहा ले करिहों जहाँ यसौदा मैय्या॥ [3] अद्भुत लीला, अद्भुत वैभव शत् शुकदेव कहईया। 'व्यास' दास पुकारत वनते थौरे लोग सुनइया॥ [4] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (192) वृन्दावन सांचौ धन भैया। कनक कुट कौतिक लागी तजि, भेजो कुमारी कन्याएँ। [1] जहाँ श्री राधा के चरण कमल हैं। गोपी नाचे, तीनों मोहन वेणु बजावे। [2] कामधेनु छीर सिन्धु तजि भजहु नन्द की पुत्री। कहाँ मोक्ष जाते हो, कहाँ यशोदा मैया... [3] अद्भुत लीला, अद्भुत महिमा, शत शुकदेव जी ने कहा। 'व्यास' दास ने पुकारा, सबने सुना.. [4] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (192)
कहाँ हौं वृंदावन तजि जाउँखरौ-खरौ सब लेत हैं परखि पारखू सार