कहाँ हौं वृंदावन तजि जाउँ

Vyas Vani — श्री हरिराम व्यास

Verse 132 of 139

(राग सारंग) वृंदाबन की सोभा देखे मेरे नैन सिरात। कुंज निकुंज पुंज सुख बरसत हरषत सबकौ गात॥ [1] राधा मोहनके निज मंदिर महाप्रलय नहीं जात। ब्रह्मातें उपज्यो न अखंडित कबहूँ नाहिं नसात॥ [2] फनिपर रवि तरि नहिं बिराट महँ नहिं संध्या नहिं प्रात। माया कालरहित नित नूतन सदा फूल फल पात॥ [3] निरगुन सगुन ब्रह्मतें न्यारौ बिहरत सदा सुहात। ब्यास बिलास रास अद्भुत गति, निगम अगोचर बात॥ [4] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (6) (राग सारंग) मेरी आँखें वृन्दावन का सौंदर्य देख सकें। कुंज, निकुंज, पुंज, सुख, वर्षा, उल्लास, सब खो गये। [1] राधामोहन का निज मंदिर, जिससे न हो कोई बड़ा अनर्थ। ब्रह्मतेन उपज्यो न अखण्ड न नष्ट।।[2] फनिपर रवि, तारे नहीं, संध्या नहीं, महासंध्या नहीं, प्रभात नहीं। माया कालातीत है, नित्य नवीन है, सदैव फलों से परिपूर्ण है.. [3] निरागुण, सगुण ब्रह्मतेन, न्यारौ बिहारत, सदैव सुखदाई। ब्यास बिलास रस अद्भुत गति, निगम अदृश्य वस्तु.. [4] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्द्ध (6)
खरौ-खरौ सब लेत हैं परखि पारखू सारखरौ-खरौ सब लेत हैं परखि पारखू सार