खरौ-खरौ सब लेत हैं परखि पारखू सार
Vyas Vani — श्री हरिराम व्यास
Verse 135 of 139
वृंदावन तजि जे सुख चाहत, तेई राक्षस प्रेत।
‘व्यास' दास के उरमें बैठ्यौ, मोहन कहि-कहि देत॥
- विशाखा अवतार श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (91)
सुख की चाह रखने वाली वृन्दावन ताजी एक राक्षसी भूत से बंधी हुई है। 'व्यास' दास के पात्र में तुम बैठो, मोहन कहीं देता है.. - विशाखा अवतार श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (91)