खरौ-खरौ सब लेत हैं परखि पारखू सार
Vyas Vani — श्री हरिराम व्यास
Verse 31 of 139
व्यास रसिकजन ते बड़े, व्रज तजि अनत न जाहिं।
वृंदावन के स्वपच लौं, जूँठनि माँगैं खाँहि॥
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (40)
व्यास रसिकजन से बड़े हैं, व्रज अनंत नहीं है। मैं वृन्दावन की कृपा की कामना करता हूँ.. - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (40)