कहाँ हौं वृंदावन तजि जाउँ
Vyas Vani — श्री हरिराम व्यास
Verse 47 of 139
(राग सारंग)
श्रीराधावल्लभ की नव-कीरति वरनत हू न निघात।
भरतखंड की सु कविमंडली वरनत हू न अघात॥ [1]
बड़े रसिक जयदेव वखानी लीला अमृत चुचात।
(श्री) वृंदावन हरिवंश प्रसंसित, सुनि गोरी मुसकात॥ [2]
राग सहित हरिदास कही रस नदी बही न थहात।
रसिक अनन्यनि की जूँठनि ‘व्यास’ सखी, रुचि सुचि कै खात॥ [3]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (59)
(राग सारंग) श्री राधावल्लभ की नवीन प्रसिद्धि का वर्णन करता है। भरतखंड के अच्छे काव्य समूह का वर्णन, मैं घायल नहीं हूं.. [1] बड़े रसिक जयदेव वखानि लीला अमृत चुचत। (श्री) वृन्दावन हरिवंश ने गुण गाए, सुन्दर मुसकानें सुनीं। [2] हरिदास राग सहित, रस की नदी न कहीं बही। जुंठाणी 'व्यास', रसिक अनन्यानि की सखी, रुचि सुचि की खाट.. [3] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्द्ध (59)