कहाँ हौं वृंदावन तजि जाउँ

Vyas Vani — श्री हरिराम व्यास

Verse 49 of 139

(राग सारंग) राधिका-रवन जय। नवलकुँवरि वृंदावनवासी निज दासिन दिखरावत सुख चय॥ [1] जाकै चरनकमल सेवत नितु रसिक अनन्य भये सब निरभय। [2] ताकै नाम रूप गुन गावत पावत महाप्रसाद रसालय॥ [3] नवनिकुंज रति पुंजनि वरषत परसत अंग ललित लीलामय। [4] ताकी आस व्यास नहिं छाँड़हि, जद्दपि लोक भये सब निर्दय॥ [5] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (60) (राग सारंगा)राधिका-रावण जय। उनकी वृन्दावन निवासी दासी नवलकुँवरि उनके सुखों का प्रदर्शन करती है। [1] वे चरण कमलों में जाते हैं और सभी प्रेमियों की सेवा करते हैं, अन्य सभी निर्भय हैं, सभी निर्भय हैं। [2] ताकै नाम रूप गुण वाणी महाप्रसाद रसालय की मान्यता। [3] नवनिकुंज रति पुंजनि वरसत् परसत् अंग ललित लीलामय। [4] जिसके कारण व्यास के पास छंद नहीं है, भले ही सभी लोग क्रूर हों.. [5] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (60)
खरौ-खरौ सब लेत हैं परखि पारखू सारकहाँ हौं वृंदावन तजि जाउँ