खरौ-खरौ सब लेत हैं परखि पारखू सार
Vyas Vani — श्री हरिराम व्यास
Verse 56 of 139
राधा वल्लभ मधुर रस, जाकैं हृदय नहिं व्यास।
मानुष देही रतनसी, भली विगारी तास॥
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (71)
राधावल्लभ, मधुर रस, हृदय में उतरो, व्यास में नहीं। मानव शरीर एक रत्न है, यह सुविकसित है। - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (71) जिसके हृदय में श्री राधा-कृष्ण का मधुर रस नहीं है, उसने रत्न के समान यह अनमोल मानव शरीर पाकर भी अपना जीवन खराब कर लिया है।