खरौ-खरौ सब लेत हैं परखि पारखू सार
Vyas Vani — श्री हरिराम व्यास
Verse 65 of 139
नर देही द्वारौ खुल्यौ, हरि पावन की घात।
'व्यास' फेरि नहिं लगतु है, तरुवर टूट्यौ पात॥
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (87)
मानव तन के द्वार खोलो, हरि के पावन धाम। 'व्यास' फिर नहीं बदल रहा, टूट गया है.. - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (87)