रूप तेरौरी मोपै बरन्यौं न जाइ

Vyas Vani — श्री हरिराम व्यास

Verse 79 of 139

(राग गन्धार) रूप तेरौरी मोपै बरन्यौं न जाइ। रोम रोम जो रसना पावौं तौ गाऊँ तेरौ गुन अघाइ॥ [1] कोटि जतन जौ कीजै कैसैं हूँ सरवा सिंधु न माइ। कैसैं ‘व्यास’ रंक की बसनी, लंक, सुमेरु समाइ॥ [2] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्द्ध (123) (राग गांधार) रूप तरौरी मोपै बरनयु न जाई। मैं समस्त सिन्धु की माता हूँ। 'व्यास' कैसे हुए दरिद्र, लंका, सुमेरु समाई.. [2] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्द्ध (123)
खरौ-खरौ सब लेत हैं परखि पारखू सारमन बावरे तूँ हरि पद अटक्यौ