मन बावरे तूँ हरि पद अटक्यौ
Vyas Vani — श्री हरिराम व्यास
Verse 80 of 139
(राग कान्हरौ)
मन बावरे तूँ हरि पद अटक्यौ।
अब, तैं साँचौ सुख पायौ तब, दुख लगि घर घर भटक्यौ॥ [1]
भली करी तैं मोह तोरिकैं, वृंदावन कौं सटक्यौ।
तें देख्यौ कुंजनिमें मोहन, राधा के उर लटक्यौ॥ [2]
तेरे वस को, को न विगूच्यौ, जनमत मरत न मटक्यौ।
व्यास दासह्वै कैं किनि उवरहु, आसा डाइन सब जग गटक्यौ॥ [3]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (132)
(राग कान्हारौ) मन बावरे तू हरि पद अटक्यौ। अब तुमने सब सुख खो दिये हैं, फिर दु:ख में घर-घर भटकते हो... [1] मोह को वश में करके तुमने अच्छा किया, परन्तु वृन्दावन में तुम्हें किसने कष्ट दिया है? तभी मैंने रसोई में मोहन को देखा, राधा और तुम लटक रहे हो... [2] तुम्हारे कपड़े न तो खराब हुए थे, न वे पैदा हुए थे, न मरे थे, न ही फेंके गए थे। व्यास दशवै कैं किनि उवरहु, अस दैण सब जग गटक्यौ.. [3] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (132)