राधामाधव अद्भुत जोरी
Yugal Shataka — श्री भट्ट देवाचार्य
Verse 19 of 29
संतो, सेव्य हमारे श्रीपिय प्यारे, वृन्दाविपिन विलासी।
नंदनँदन वृषभानुनंदनी, चरन अनन्य उपासी॥ [1]
मत्त प्रणय बस सदा एकरस, बिबिध निकुंज निवासी।
श्रीभट जुगल बंशीबट सेवत, मूरति सब सुखरासी॥ [2]
- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (5)
साधो सेवी हमारी प्रिय प्रिया वृंदाविपिन विलासी। नन्दनन्दन वृषभानुनन्दनि समर्पित चरणम्। [1] नशीला प्यार हमेशा एक जैसा होता है, विविध क्षेत्रों में बसता है। श्री भट्ट जुगल बंशीबत सेवत, मुराति सब सुखरासी.. [2] - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (5)