जुगुलकिसोर हमारे ठाकुर

Yugal Shataka — श्री भट्ट देवाचार्य

Verse 28 of 29

(राग एकताल) जुगुलकिसोर हमारे ठाकुर। [1] सदा सरबदा हम जिनके हैं , जनम जनम घरजाये चाकर॥ [2] चूक परै परिहरैं न कबहूँ , सबही भाँति दयाके आकर। [3] जै श्रीभट्ट प्रगट त्रिभुवनमें , प्रनतनि पोषत परम सुधाकर॥ [4] - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (7) (राग एकताल) जुगुलकिशोर हमारे ठाकुर। [1] हम तो उसके हैं, जन्म-जन्मान्तर नौकर बनकर घर जाते हैं.. [2] परायों से कब बचूँ, हर तरह काम आऊँ। [3] जय श्री भट्ट प्रगट त्रिभुवनमेन, प्रणातनि पोषत् परम सुधाकर। [4] - श्री भट्ट देवाचार्य, दोहरा शतक (7)
राधामाधव अद्भुत जोरीढारौं निज कर चँवर लै, धारौं नैननि नेह