रसमय धाम सृष्टि

Yugal Sneh Patrika — श्री चाचा हित वृंदावनदास

Verse 5 of 5

यह रस ब्रह्मलोक पाताल अवनी हूँ दरसत नाहैं। या रसकौं कमलापुर हूँ के तरसत हैं मन माहैं॥ [1] यह रस रासेश्वरी कृपातैं प्रेमी जन अवगाहैं। वृंदावन हित रूप जुगल रहैं या रस भरे उमगहैं॥ [2] - चाचा श्री हित वृंदावन दास, श्रीयुगल सनेह पत्रिका (55) यः रस ब्रह्मलोक, पाताल अवनि, हम दिखाई नहीं देते। अथवा मेरा हृदय कमलापुर के किस सार की अभिलाषा कर रहा है? [1] यह रस रसेश्वरी दयालु और प्रेममयी है। वृन्दावन के हिट जुगल या परमानंद से भरपूर हैं.. [2] - अंकल श्री हित वृन्दावन दास, श्रीयुगल सनेह पत्रिका (55)
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