रसमय धाम सृष्टि
Yugal Sneh Patrika — श्री चाचा हित वृंदावनदास
Verse 4 of 5
रसमय धाम सृष्टि जहाँ रसमय कथा अलौकिक न्यारी।
रासेश्वरी कृपा तैं जानै और नहीं अधिकारी॥ [1]
बुधिबल करत करि गये करि हैं पंडित और अनारी।
वृन्दावन हित रूप न परचे नीरस तर्क विकारी॥ [2]
- श्री वृंदावन दास चाचा जी, युगल स्नेह पत्रिका
रसमय धाम सृष्टि जहां रसमय कथा अलौकिक रूप से अद्वितीय है। रासेश्वरी की कृपा से तुम अधिकारी नहीं, बुद्धिमान हो गये। [1] ज्ञानी और अज्ञानी को बुद्धिमान बनाया। वृन्दावन के स्वरूप का सार नहीं बदलता, नीरस तर्क कुटिल है.. [2] - श्री वृन्दावन दास चाचा जी, युगल स्नेह पत्रिका