प्राणपति विहरत श्री यमुना कूले

चतुर्भुजदास

Pada 17

प्राणपति विहरत श्री यमुना कूले । लुब्ध मकरंद के भ्रमर ज्यों बस भये, देखि रवि उदय मानो कमल फूले ॥१॥ करत गुंजार मुरली जु ले सांवरो, सुनत ब्रजवधू तन सुधि जु भूले । चतुर्भुज दास श्री यमुने प्रेमसिंधु में लाल गिरिधरनवर हरखि झूले ॥२॥
वारंवार श्रीयमुने गुणगान कीजेचित्त में श्री यमुना, निशिदिन जु राखो