बैद को बैद गुनी को गुनी

कृष्णदास

Pada 1

बैद को बैद गुनी को गुनी ठग को ठग ढूमक को मन भावै । काग को काग मराल मराल को कान्ध गधा को खजुलावै । कृष्ण भनै बुध को बुध त्योँ अरु रागी को रागी मिलै सुर गावै । ग्यानी सो ग्यानी करै चरचा लबरा के ढिँगै लबरा सुख पावै । कृष्णदास का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल मेहरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।
मो मन गिरिधर छबि पै अटक्यो