मो मन गिरिधर छबि पै अटक्यो

कृष्णदास

Pada 2

मो मन गिरिधर छबि पै अटक्यो। ललित त्रिभंग चाल पै चलि कै, चिबुक चारु गडि ठठक्यो॥ सजल स्याम घन बरन लीन ह्वै, फिर चित अनत न भटक्यो। 'कृष्णदास किए प्रान निछावर, यह तन जग सिर पटक्यो॥
बैद को बैद गुनी को गुनीदेख जिऊँ माई नयन रँगीलो