कहा करौं वह मूरति जिय ते न टरई

कुम्भनदास

Pada 4

कहा करौं वह मूरति जिय ते न टरई। सुंदर नंद कुँवर के बिछुरे, निस दिन नींद न परई॥ बहु विधि मिलन प्रान प्यारे की, एक निमिष न बिसरई। वे गुन समुझि समुझि चित नैननि नीर निरंतर ढरई॥ कछु न सुहाय तलाबेली मनु, बिरह अनल तन जरई। 'कुंभनदास लाल गिरधन बिनु, समाधान को करई।
माई हौं गिरधरन के गुन गाऊँसीतल सदन में सीतल भोजन भयौ