सीतल सदन में सीतल भोजन भयौ

कुम्भनदास

Pada 5

सीतल सदन में सीतल भोजन भयौ, सीतल बातन करत आई सब सखियाँ । छीर के गुलाब-नीर, पीरे-पीरे पानन बीरी, आरोगौ नाथ ! सीरी होत छतियाँ ॥ जल गुलाब घोर लाईं अरगजा-चंदन, मन अभिलाष यह अंग लपटावनौ । कुंभनदास प्रभु गोवरधन-धर, कीजै सुख सनेह, मैं बीजना ढुरावनौ ॥
कहा करौं वह मूरति जिय ते न टरईबैठे लाल फूलन के चौवारे