गोपी प्रेम की ध्वजा

परमानंददास

Pada 26

गोपी प्रेम की ध्वजा । निज गोपाल किते अपने वश उरधर श्याम भुजा ॥१॥ शुक मुनि व्यास प्रशंसा कीनी ऊधो संत सराही । भुरि भाग्य गोकुल की वनिता अति पुनीत भवमांहि ॥२॥ कहा भयो जो विप्रकुल जनम्यो जो हरिसेवा नाही । सोई कुलीन दास परमानंद जो हरि सन्मुख धाई ॥३॥
जागो मेरे लाल जगत उजियारेतिहारे चरन कमल को माहत्म्य