बाल काण्ड — Sections 181–190
सुख संपति सुत सेन सहाई। जय प्रताप बल बुद्धि बड़ाई।। नित नूतन सब बाढ़त जाई। जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई।। अतिबल कुंभकरन अस भ्राता। जेहि कहुँ नहिं प्रतिभट जग जाता।। करइ पान सोवइ षट मासा। जागत होइ तिहुँ पुर त्रासा।। जौं दिन प्रति अहार कर सोई। बिस्व बेगि सब चौपट होई।। समर धीर नहिं जाइ बखाना। तेहि सम अमित बीर बलवाना।। बारिदनाद जेठ सुत तासू। भट महुँ प्रथम लीक जग जासू।। जेहि न होइ रन सनमुख कोई। सुरपुर नितहिं परावन होई।।
कुमुख अकंपन कुलिसरद धूमकेतु अतिकाय। एक एक जग जीति सक ऐसे सुभट निकाय।।180।।
कामरूप जानहिं सब माया। सपनेहुँ जिन्ह कें धरम न दाया।। दसमुख बैठ सभाँ एक बारा। देखि अमित आपन परिवारा।। सुत समूह जन परिजन नाती। गे को पार निसाचर जाती।। सेन बिलोकि सहज अभिमानी। बोला बचन क्रोध मद सानी।। सुनहु सकल रजनीचर जूथा। हमरे बैरी बिबुध बरूथा।। ते सनमुख नहिं करही लराई। देखि सबल रिपु जाहिं पराई।। तेन्ह कर मरन एक बिधि होई। कहउँ बुझाइ सुनहु अब सोई।। द्विजभोजन मख होम सराधा।।सब कै जाइ करहु तुम्ह बाधा।।
छुधा छीन बलहीन सुर सहजेहिं मिलिहहिं आइ। तब मारिहउँ कि छाड़िहउँ भली भाँति अपनाइ।।181।।
मेघनाद कहुँ पुनि हँकरावा। दीन्ही सिख बलु बयरु बढ़ावा।। जे सुर समर धीर बलवाना। जिन्ह कें लरिबे कर अभिमाना।। तिन्हहि जीति रन आनेसु बाँधी। उठि सुत पितु अनुसासन काँधी।। एहि बिधि सबही अग्या दीन्ही। आपुनु चलेउ गदा कर लीन्ही।। चलत दसानन डोलति अवनी। गर्जत गर्भ स्त्रवहिं सुर रवनी।। रावन आवत सुनेउ सकोहा। देवन्ह तके मेरु गिरि खोहा।। दिगपालन्ह के लोक सुहाए। सूने सकल दसानन पाए।। पुनि पुनि सिंघनाद करि भारी। देइ देवतन्ह गारि पचारी।। रन मद मत्त फिरइ जग धावा। प्रतिभट खौजत कतहुँ न पावा।। रबि ससि पवन बरुन धनधारी। अगिनि काल जम सब अधिकारी।। किंनर सिद्ध मनुज सुर नागा। हठि सबही के पंथहिं लागा।। ब्रह्मसृष्टि जहँ लगि तनुधारी। दसमुख बसबर्ती नर नारी।। आयसु करहिं सकल भयभीता। नवहिं आइ नित चरन बिनीता।।
भुजबल बिस्व बस्य करि राखेसि कोउ न सुतंत्र। मंडलीक मनि रावन राज करइ निज मंत्र।।182(क)।। देव जच्छ गंधर्व नर किंनर नाग कुमारि। जीति बरीं निज बाहुबल बहु सुंदर बर नारि।।182ख।।
इंद्रजीत सन जो कछु कहेऊ। सो सब जनु पहिलेहिं करि रहेऊ।। प्रथमहिं जिन्ह कहुँ आयसु दीन्हा। तिन्ह कर चरित सुनहु जो कीन्हा।। देखत भीमरूप सब पापी। निसिचर निकर देव परितापी।। करहि उपद्रव असुर निकाया। नाना रूप धरहिं करि माया।। जेहि बिधि होइ धर्म निर्मूला। सो सब करहिं बेद प्रतिकूला।। जेहिं जेहिं देस धेनु द्विज पावहिं। नगर गाउँ पुर आगि लगावहिं।। सुभ आचरन कतहुँ नहिं होई। देव बिप्र गुरू मान न कोई।। नहिं हरिभगति जग्य तप ग्याना। सपनेहुँ सुनिअ न बेद पुराना।।
जप जोग बिरागा तप मख भागा श्रवन सुनइ दससीसा। आपुनु उठि धावइ रहै न पावइ धरि सब घालइ खीसा।। अस भ्रष्ट अचारा भा संसारा धर्म सुनिअ नहि काना। तेहि बहुबिधि त्रासइ देस निकासइ जो कह बेद पुराना।।
बरनि न जाइ अनीति घोर निसाचर जो करहिं। हिंसा पर अति प्रीति तिन्ह के पापहि कवनि मिति।।183।।
बाढ़े खल बहु चोर जुआरा। जे लंपट परधन परदारा।। मानहिं मातु पिता नहिं देवा। साधुन्ह सन करवावहिं सेवा।। जिन्ह के यह आचरन भवानी। ते जानेहु निसिचर सब प्रानी।। अतिसय देखि धर्म कै ग्लानी। परम सभीत धरा अकुलानी।। गिरि सरि सिंधु भार नहिं मोही। जस मोहि गरुअ एक परद्रोही।। सकल धर्म देखइ बिपरीता। कहि न सकइ रावन भय भीता।। धेनु रूप धरि हृदयँ बिचारी। गई तहाँ जहँ सुर मुनि झारी।। निज संताप सुनाएसि रोई। काहू तें कछु काज न होई।।
सुर मुनि गंधर्बा मिलि करि सर्बा गे बिरंचि के लोका। सँग गोतनुधारी भूमि बिचारी परम बिकल भय सोका।। ब्रह्माँ सब जाना मन अनुमाना मोर कछू न बसाई। जा करि तैं दासी सो अबिनासी हमरेउ तोर सहाई।।
धरनि धरहि मन धीर कह बिरंचि हरिपद सुमिरु। जानत जन की पीर प्रभु भंजिहि दारुन बिपति।।184।।
बैठे सुर सब करहिं बिचारा। कहँ पाइअ प्रभु करिअ पुकारा।। पुर बैकुंठ जान कह कोई। कोउ कह पयनिधि बस प्रभु सोई।। जाके हृदयँ भगति जसि प्रीति। प्रभु तहँ प्रगट सदा तेहिं रीती।। तेहि समाज गिरिजा मैं रहेऊँ। अवसर पाइ बचन एक कहेऊँ।। हरि ब्यापक सर्बत्र समाना। प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना।। देस काल दिसि बिदिसिहु माहीं। कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं।। अग जगमय सब रहित बिरागी। प्रेम तें प्रभु प्रगटइ जिमि आगी।। मोर बचन सब के मन माना। साधु साधु करि ब्रह्म बखाना।।
सुनि बिरंचि मन हरष तन पुलकि नयन बह नीर। अस्तुति करत जोरि कर सावधान मतिधीर।।185।।
जय जय सुरनायक जन सुखदायक प्रनतपाल भगवंता। गो द्विज हितकारी जय असुरारी सिधुंसुता प्रिय कंता।। पालन सुर धरनी अद्भुत करनी मरम न जानइ कोई। जो सहज कृपाला दीनदयाला करउ अनुग्रह सोई।। जय जय अबिनासी सब घट बासी ब्यापक परमानंदा। अबिगत गोतीतं चरित पुनीतं मायारहित मुकुंदा।। जेहि लागि बिरागी अति अनुरागी बिगतमोह मुनिबृंदा। निसि बासर ध्यावहिं गुन गन गावहिं जयति सच्चिदानंदा।। जेहिं सृष्टि उपाई त्रिबिध बनाई संग सहाय न दूजा। सो करउ अघारी चिंत हमारी जानिअ भगति न पूजा।। जो भव भय भंजन मुनि मन रंजन गंजन बिपति बरूथा। मन बच क्रम बानी छाड़ि सयानी सरन सकल सुर जूथा।। सारद श्रुति सेषा रिषय असेषा जा कहुँ कोउ नहि जाना। जेहि दीन पिआरे बेद पुकारे द्रवउ सो श्रीभगवाना।। भव बारिधि मंदर सब बिधि सुंदर गुनमंदिर सुखपुंजा। मुनि सिद्ध सकल सुर परम भयातुर नमत नाथ पद कंजा।।
जानि सभय सुरभूमि सुनि बचन समेत सनेह। गगनगिरा गंभीर भइ हरनि सोक संदेह।।186।।
जनि डरपहु मुनि सिद्ध सुरेसा। तुम्हहि लागि धरिहउँ नर बेसा।। अंसन्ह सहित मनुज अवतारा। लेहउँ दिनकर बंस उदारा।। कस्यप अदिति महातप कीन्हा। तिन्ह कहुँ मैं पूरब बर दीन्हा।। ते दसरथ कौसल्या रूपा। कोसलपुरीं प्रगट नरभूपा।। तिन्ह के गृह अवतरिहउँ जाई। रघुकुल तिलक सो चारिउ भाई।। नारद बचन सत्य सब करिहउँ। परम सक्ति समेत अवतरिहउँ।। हरिहउँ सकल भूमि गरुआई। निर्भय होहु देव समुदाई।। गगन ब्रह्मबानी सुनी काना। तुरत फिरे सुर हृदय जुड़ाना।। तब ब्रह्मा धरनिहि समुझावा। अभय भई भरोस जियँ आवा।।
निज लोकहि बिरंचि गे देवन्ह इहइ सिखाइ। बानर तनु धरि धरि महि हरि पद सेवहु जाइ।।187।।
गए देव सब निज निज धामा। भूमि सहित मन कहुँ बिश्रामा । जो कछु आयसु ब्रह्माँ दीन्हा। हरषे देव बिलंब न कीन्हा।। बनचर देह धरि छिति माहीं। अतुलित बल प्रताप तिन्ह पाहीं।। गिरि तरु नख आयुध सब बीरा। हरि मारग चितवहिं मतिधीरा।। गिरि कानन जहँ तहँ भरि पूरी। रहे निज निज अनीक रचि रूरी।। यह सब रुचिर चरित मैं भाषा। अब सो सुनहु जो बीचहिं राखा।। अवधपुरीं रघुकुलमनि राऊ। बेद बिदित तेहि दसरथ नाऊँ।। धरम धुरंधर गुननिधि ग्यानी। हृदयँ भगति मति सारँगपानी।।
कौसल्यादि नारि प्रिय सब आचरन पुनीत। पति अनुकूल प्रेम दृढ़ हरि पद कमल बिनीत।।188।।
एक बार भूपति मन माहीं। भै गलानि मोरें सुत नाहीं।। गुर गृह गयउ तुरत महिपाला। चरन लागि करि बिनय बिसाला।। निज दुख सुख सब गुरहि सुनायउ। कहि बसिष्ठ बहुबिधि समुझायउ।। धरहु धीर होइहहिं सुत चारी। त्रिभुवन बिदित भगत भय हारी।। सृंगी रिषहि बसिष्ठ बोलावा। पुत्रकाम सुभ जग्य करावा।। भगति सहित मुनि आहुति दीन्हें। प्रगटे अगिनि चरू कर लीन्हें।। जो बसिष्ठ कछु हृदयँ बिचारा। सकल काजु भा सिद्ध तुम्हारा।। यह हबि बाँटि देहु नृप जाई। जथा जोग जेहि भाग बनाई।।
तब अदृस्य भए पावक सकल सभहि समुझाइ।। परमानंद मगन नृप हरष न हृदयँ समाइ।।189।।