बाल काण्ड — Sections 31–40
जागबलिक जो कथा सुहाई। भरद्वाज मुनिबरहि सुनाई।। कहिहउँ सोइ संबाद बखानी। सुनहुँ सकल सज्जन सुखु मानी।। संभु कीन्ह यह चरित सुहावा। बहुरि कृपा करि उमहि सुनावा।। सोइ सिव कागभुसुंडिहि दीन्हा। राम भगत अधिकारी चीन्हा।। तेहि सन जागबलिक पुनि पावा। तिन्ह पुनि भरद्वाज प्रति गावा।। ते श्रोता बकता समसीला। सवँदरसी जानहिं हरिलीला।। जानहिं तीनि काल निज ग्याना। करतल गत आमलक समाना।। औरउ जे हरिभगत सुजाना। कहहिं सुनहिं समुझहिं बिधि नाना।।
मै पुनि निज गुर सन सुनी कथा सो सूकरखेत। समुझी नहि तसि बालपन तब अति रहेउँ अचेत।।30(क)।। श्रोता बकता ग्याननिधि कथा राम कै गूढ़। किमि समुझौं मै जीव जड़ कलि मल ग्रसित बिमूढ़।।30(ख)।।
तदपि कही गुर बारहिं बारा। समुझि परी कछु मति अनुसारा।। भाषाबद्ध करबि मैं सोई। मोरें मन प्रबोध जेहिं होई।। जस कछु बुधि बिबेक बल मेरें। तस कहिहउँ हियँ हरि के प्रेरें।। निज संदेह मोह भ्रम हरनी। करउँ कथा भव सरिता तरनी।। बुध बिश्राम सकल जन रंजनि। रामकथा कलि कलुष बिभंजनि।। रामकथा कलि पंनग भरनी। पुनि बिबेक पावक कहुँ अरनी।। रामकथा कलि कामद गाई। सुजन सजीवनि मूरि सुहाई।। सोइ बसुधातल सुधा तरंगिनि। भय भंजनि भ्रम भेक भुअंगिनि।। असुर सेन सम नरक निकंदिनि। साधु बिबुध कुल हित गिरिनंदिनि।। संत समाज पयोधि रमा सी। बिस्व भार भर अचल छमा सी।। जम गन मुहँ मसि जग जमुना सी। जीवन मुकुति हेतु जनु कासी।। रामहि प्रिय पावनि तुलसी सी। तुलसिदास हित हियँ हुलसी सी।। सिवप्रय मेकल सैल सुता सी। सकल सिद्धि सुख संपति रासी।। सदगुन सुरगन अंब अदिति सी। रघुबर भगति प्रेम परमिति सी।।
राम कथा मंदाकिनी चित्रकूट चित चारु। तुलसी सुभग सनेह बन सिय रघुबीर बिहारु।।31।।
राम चरित चिंतामनि चारू। संत सुमति तिय सुभग सिंगारू।। जग मंगल गुन ग्राम राम के। दानि मुकुति धन धरम धाम के।। सदगुर ग्यान बिराग जोग के। बिबुध बैद भव भीम रोग के।। जननि जनक सिय राम प्रेम के। बीज सकल ब्रत धरम नेम के।। समन पाप संताप सोक के। प्रिय पालक परलोक लोक के।। सचिव सुभट भूपति बिचार के। कुंभज लोभ उदधि अपार के।। काम कोह कलिमल करिगन के। केहरि सावक जन मन बन के।। अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के। कामद घन दारिद दवारि के।। मंत्र महामनि बिषय ब्याल के। मेटत कठिन कुअंक भाल के।। हरन मोह तम दिनकर कर से। सेवक सालि पाल जलधर से।। अभिमत दानि देवतरु बर से। सेवत सुलभ सुखद हरि हर से।। सुकबि सरद नभ मन उडगन से। रामभगत जन जीवन धन से।। सकल सुकृत फल भूरि भोग से। जग हित निरुपधि साधु लोग से।। सेवक मन मानस मराल से। पावक गंग तंरग माल से।।
कुपथ कुतरक कुचालि कलि कपट दंभ पाषंड। दहन राम गुन ग्राम जिमि इंधन अनल प्रचंड।।32(क)।। रामचरित राकेस कर सरिस सुखद सब काहु। सज्जन कुमुद चकोर चित हित बिसेषि बड़ लाहु।।32(ख)।।
कीन्हि प्रस्न जेहि भाँति भवानी। जेहि बिधि संकर कहा बखानी।। सो सब हेतु कहब मैं गाई। कथाप्रबंध बिचित्र बनाई।। जेहि यह कथा सुनी नहिं होई। जनि आचरजु करैं सुनि सोई।। कथा अलौकिक सुनहिं जे ग्यानी। नहिं आचरजु करहिं अस जानी।। रामकथा कै मिति जग नाहीं। असि प्रतीति तिन्ह के मन माहीं।। नाना भाँति राम अवतारा। रामायन सत कोटि अपारा।। कलपभेद हरिचरित सुहाए। भाँति अनेक मुनीसन्ह गाए।। करिअ न संसय अस उर आनी। सुनिअ कथा सारद रति मानी।।
राम अनंत अनंत गुन अमित कथा बिस्तार। सुनि आचरजु न मानिहहिं जिन्ह कें बिमल बिचार।।33।।
एहि बिधि सब संसय करि दूरी। सिर धरि गुर पद पंकज धूरी।। पुनि सबही बिनवउँ कर जोरी। करत कथा जेहिं लाग न खोरी।। सादर सिवहि नाइ अब माथा। बरनउँ बिसद राम गुन गाथा।। संबत सोरह सै एकतीसा। करउँ कथा हरि पद धरि सीसा।। नौमी भौम बार मधु मासा। अवधपुरीं यह चरित प्रकासा।। जेहि दिन राम जनम श्रुति गावहिं। तीरथ सकल तहाँ चलि आवहिं।। असुर नाग खग नर मुनि देवा। आइ करहिं रघुनायक सेवा।। जन्म महोत्सव रचहिं सुजाना। करहिं राम कल कीरति गाना।।
मज्जहि सज्जन बृंद बहु पावन सरजू नीर। जपहिं राम धरि ध्यान उर सुंदर स्याम सरीर।।34।।
दरस परस मज्जन अरु पाना। हरइ पाप कह बेद पुराना।। नदी पुनीत अमित महिमा अति। कहि न सकइ सारद बिमलमति।। राम धामदा पुरी सुहावनि। लोक समस्त बिदित अति पावनि।। चारि खानि जग जीव अपारा। अवध तजे तनु नहि संसारा।। सब बिधि पुरी मनोहर जानी। सकल सिद्धिप्रद मंगल खानी।। बिमल कथा कर कीन्ह अरंभा। सुनत नसाहिं काम मद दंभा।। रामचरितमानस एहि नामा। सुनत श्रवन पाइअ बिश्रामा।। मन करि विषय अनल बन जरई। होइ सुखी जौ एहिं सर परई।। रामचरितमानस मुनि भावन। बिरचेउ संभु सुहावन पावन।। त्रिबिध दोष दुख दारिद दावन। कलि कुचालि कुलि कलुष नसावन।। रचि महेस निज मानस राखा। पाइ सुसमउ सिवा सन भाषा।। तातें रामचरितमानस बर। धरेउ नाम हियँ हेरि हरषि हर।। कहउँ कथा सोइ सुखद सुहाई। सादर सुनहु सुजन मन लाई।।
जस मानस जेहि बिधि भयउ जग प्रचार जेहि हेतु। अब सोइ कहउँ प्रसंग सब सुमिरि उमा बृषकेतु।।35।।
संभु प्रसाद सुमति हियँ हुलसी। रामचरितमानस कबि तुलसी।। करइ मनोहर मति अनुहारी। सुजन सुचित सुनि लेहु सुधारी।। सुमति भूमि थल हृदय अगाधू। बेद पुरान उदधि घन साधू।। बरषहिं राम सुजस बर बारी। मधुर मनोहर मंगलकारी।। लीला सगुन जो कहहिं बखानी। सोइ स्वच्छता करइ मल हानी।। प्रेम भगति जो बरनि न जाई। सोइ मधुरता सुसीतलताई।। सो जल सुकृत सालि हित होई। राम भगत जन जीवन सोई।। मेधा महि गत सो जल पावन। सकिलि श्रवन मग चलेउ सुहावन।। भरेउ सुमानस सुथल थिराना। सुखद सीत रुचि चारु चिराना।।
सुठि सुंदर संबाद बर बिरचे बुद्धि बिचारि। तेइ एहि पावन सुभग सर घाट मनोहर चारि।।36।।
सप्त प्रबन्ध सुभग सोपाना। ग्यान नयन निरखत मन माना।। रघुपति महिमा अगुन अबाधा। बरनब सोइ बर बारि अगाधा।। राम सीय जस सलिल सुधासम। उपमा बीचि बिलास मनोरम।। पुरइनि सघन चारु चौपाई। जुगुति मंजु मनि सीप सुहाई।। छंद सोरठा सुंदर दोहा। सोइ बहुरंग कमल कुल सोहा।। अरथ अनूप सुमाव सुभासा। सोइ पराग मकरंद सुबासा।। सुकृत पुंज मंजुल अलि माला। ग्यान बिराग बिचार मराला।। धुनि अवरेब कबित गुन जाती। मीन मनोहर ते बहुभाँती।। अरथ धरम कामादिक चारी। कहब ग्यान बिग्यान बिचारी।। नव रस जप तप जोग बिरागा। ते सब जलचर चारु तड़ागा।। सुकृती साधु नाम गुन गाना। ते बिचित्र जल बिहग समाना।। संतसभा चहुँ दिसि अवँराई। श्रद्धा रितु बसंत सम गाई।। भगति निरुपन बिबिध बिधाना। छमा दया दम लता बिताना।। सम जम नियम फूल फल ग्याना। हरि पत रति रस बेद बखाना।। औरउ कथा अनेक प्रसंगा। तेइ सुक पिक बहुबरन बिहंगा।।
पुलक बाटिका बाग बन सुख सुबिहंग बिहारु। माली सुमन सनेह जल सींचत लोचन चारु।।37।।
जे गावहिं यह चरित सँभारे। तेइ एहि ताल चतुर रखवारे।। सदा सुनहिं सादर नर नारी। तेइ सुरबर मानस अधिकारी।। अति खल जे बिषई बग कागा। एहिं सर निकट न जाहिं अभागा।। संबुक भेक सेवार समाना। इहाँ न बिषय कथा रस नाना।। तेहि कारन आवत हियँ हारे। कामी काक बलाक बिचारे।। आवत एहिं सर अति कठिनाई। राम कृपा बिनु आइ न जाई।। कठिन कुसंग कुपंथ कराला। तिन्ह के बचन बाघ हरि ब्याला।। गृह कारज नाना जंजाला। ते अति दुर्गम सैल बिसाला।। बन बहु बिषम मोह मद माना। नदीं कुतर्क भयंकर नाना।।
जे श्रद्धा संबल रहित नहि संतन्ह कर साथ। तिन्ह कहुँ मानस अगम अति जिन्हहि न प्रिय रघुनाथ।।38।।
जौं करि कष्ट जाइ पुनि कोई। जातहिं नींद जुड़ाई होई।। जड़ता जाड़ बिषम उर लागा। गएहुँ न मज्जन पाव अभागा।। करि न जाइ सर मज्जन पाना। फिरि आवइ समेत अभिमाना।। जौं बहोरि कोउ पूछन आवा। सर निंदा करि ताहि बुझावा।। सकल बिघ्न ब्यापहि नहिं तेही। राम सुकृपाँ बिलोकहिं जेही।। सोइ सादर सर मज्जनु करई। महा घोर त्रयताप न जरई।। ते नर यह सर तजहिं न काऊ। जिन्ह के राम चरन भल भाऊ।। जो नहाइ चह एहिं सर भाई। सो सतसंग करउ मन लाई।। अस मानस मानस चख चाही। भइ कबि बुद्धि बिमल अवगाही।। भयउ हृदयँ आनंद उछाहू। उमगेउ प्रेम प्रमोद प्रबाहू।। चली सुभग कबिता सरिता सो। राम बिमल जस जल भरिता सो।। सरजू नाम सुमंगल मूला। लोक बेद मत मंजुल कूला।। नदी पुनीत सुमानस नंदिनि। कलिमल तृन तरु मूल निकंदिनि।।
श्रोता त्रिबिध समाज पुर ग्राम नगर दुहुँ कूल। संतसभा अनुपम अवध सकल सुमंगल मूल।।39।।