Bala Kanda

बाल काण्ड — Sections 4150

Section 41
चौपाई

रामभगति सुरसरितहि जाई। मिली सुकीरति सरजु सुहाई।। सानुज राम समर जसु पावन। मिलेउ महानदु सोन सुहावन।। जुग बिच भगति देवधुनि धारा। सोहति सहित सुबिरति बिचारा।। त्रिबिध ताप त्रासक तिमुहानी। राम सरुप सिंधु समुहानी।। मानस मूल मिली सुरसरिही। सुनत सुजन मन पावन करिही।। बिच बिच कथा बिचित्र बिभागा। जनु सरि तीर तीर बन बागा।। उमा महेस बिबाह बराती। ते जलचर अगनित बहुभाँती।। रघुबर जनम अनंद बधाई। भवँर तरंग मनोहरताई।।

दोहा/सोरठा

बालचरित चहु बंधु के बनज बिपुल बहुरंग। नृप रानी परिजन सुकृत मधुकर बारिबिहंग।।40।।

Section 42
चौपाई

सीय स्वयंबर कथा सुहाई। सरित सुहावनि सो छबि छाई।। नदी नाव पटु प्रस्न अनेका। केवट कुसल उतर सबिबेका।। सुनि अनुकथन परस्पर होई। पथिक समाज सोह सरि सोई।। घोर धार भृगुनाथ रिसानी। घाट सुबद्ध राम बर बानी।। सानुज राम बिबाह उछाहू। सो सुभ उमग सुखद सब काहू।। कहत सुनत हरषहिं पुलकाहीं। ते सुकृती मन मुदित नहाहीं।। राम तिलक हित मंगल साजा। परब जोग जनु जुरे समाजा।। काई कुमति केकई केरी। परी जासु फल बिपति घनेरी।।

दोहा/सोरठा

समन अमित उतपात सब भरतचरित जपजाग। कलि अघ खल अवगुन कथन ते जलमल बग काग।।41।।

Section 43
चौपाई

कीरति सरित छहूँ रितु रूरी। समय सुहावनि पावनि भूरी।। हिम हिमसैलसुता सिव ब्याहू। सिसिर सुखद प्रभु जनम उछाहू।। बरनब राम बिबाह समाजू। सो मुद मंगलमय रितुराजू।। ग्रीषम दुसह राम बनगवनू। पंथकथा खर आतप पवनू।। बरषा घोर निसाचर रारी। सुरकुल सालि सुमंगलकारी।। राम राज सुख बिनय बड़ाई। बिसद सुखद सोइ सरद सुहाई।। सती सिरोमनि सिय गुनगाथा। सोइ गुन अमल अनूपम पाथा।। भरत सुभाउ सुसीतलताई। सदा एकरस बरनि न जाई।।

दोहा/सोरठा

अवलोकनि बोलनि मिलनि प्रीति परसपर हास। भायप भलि चहु बंधु की जल माधुरी सुबास।।42।।

Section 44
चौपाई

आरति बिनय दीनता मोरी। लघुता ललित सुबारि न थोरी।। अदभुत सलिल सुनत गुनकारी। आस पिआस मनोमल हारी।। राम सुप्रेमहि पोषत पानी। हरत सकल कलि कलुष गलानी।। भव श्रम सोषक तोषक तोषा। समन दुरित दुख दारिद दोषा।। काम कोह मद मोह नसावन। बिमल बिबेक बिराग बढ़ावन।। सादर मज्जन पान किए तें। मिटहिं पाप परिताप हिए तें।। जिन्ह एहि बारि न मानस धोए। ते कायर कलिकाल बिगोए।। तृषित निरखि रबि कर भव बारी। फिरिहहि मृग जिमि जीव दुखारी।।

दोहा/सोरठा

मति अनुहारि सुबारि गुन गनि मन अन्हवाइ। सुमिरि भवानी संकरहि कह कबि कथा सुहाइ।।43(क)।। अब रघुपति पद पंकरुह हियँ धरि पाइ प्रसाद । कहउँ जुगल मुनिबर्ज कर मिलन सुभग संबाद।।43(ख)।।

Section 45
चौपाई

भरद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा। तिन्हहि राम पद अति अनुरागा।। तापस सम दम दया निधाना। परमारथ पथ परम सुजाना।। माघ मकरगत रबि जब होई। तीरथपतिहिं आव सब कोई।। देव दनुज किंनर नर श्रेनी। सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनीं।। पूजहि माधव पद जलजाता। परसि अखय बटु हरषहिं गाता।। भरद्वाज आश्रम अति पावन। परम रम्य मुनिबर मन भावन।। तहाँ होइ मुनि रिषय समाजा। जाहिं जे मज्जन तीरथराजा।। मज्जहिं प्रात समेत उछाहा। कहहिं परसपर हरि गुन गाहा।।

दोहा/सोरठा

ब्रह्म निरूपम धरम बिधि बरनहिं तत्त्व बिभाग। कहहिं भगति भगवंत कै संजुत ग्यान बिराग।।44।।

Section 46
चौपाई

एहि प्रकार भरि माघ नहाहीं। पुनि सब निज निज आश्रम जाहीं।। प्रति संबत अति होइ अनंदा। मकर मज्जि गवनहिं मुनिबृंदा।। एक बार भरि मकर नहाए। सब मुनीस आश्रमन्ह सिधाए।। जगबालिक मुनि परम बिबेकी। भरव्दाज राखे पद टेकी।। सादर चरन सरोज पखारे। अति पुनीत आसन बैठारे।। करि पूजा मुनि सुजस बखानी। बोले अति पुनीत मृदु बानी।। नाथ एक संसउ बड़ मोरें। करगत बेदतत्व सबु तोरें।। कहत सो मोहि लागत भय लाजा। जौ न कहउँ बड़ होइ अकाजा।।

दोहा/सोरठा

संत कहहि असि नीति प्रभु श्रुति पुरान मुनि गाव। होइ न बिमल बिबेक उर गुर सन किएँ दुराव।।45।।

Section 47
चौपाई

अस बिचारि प्रगटउँ निज मोहू। हरहु नाथ करि जन पर छोहू।। राम नाम कर अमित प्रभावा। संत पुरान उपनिषद गावा।। संतत जपत संभु अबिनासी। सिव भगवान ग्यान गुन रासी।। आकर चारि जीव जग अहहीं। कासीं मरत परम पद लहहीं।। सोपि राम महिमा मुनिराया। सिव उपदेसु करत करि दाया।। रामु कवन प्रभु पूछउँ तोही। कहिअ बुझाइ कृपानिधि मोही।। एक राम अवधेस कुमारा। तिन्ह कर चरित बिदित संसारा।। नारि बिरहँ दुखु लहेउ अपारा। भयहु रोषु रन रावनु मारा।।

दोहा/सोरठा

प्रभु सोइ राम कि अपर कोउ जाहि जपत त्रिपुरारि। सत्यधाम सर्बग्य तुम्ह कहहु बिबेकु बिचारि।।46।।

Section 48
चौपाई

जैसे मिटै मोर भ्रम भारी। कहहु सो कथा नाथ बिस्तारी।। जागबलिक बोले मुसुकाई। तुम्हहि बिदित रघुपति प्रभुताई।। राममगत तुम्ह मन क्रम बानी। चतुराई तुम्हारी मैं जानी।। चाहहु सुनै राम गुन गूढ़ा। कीन्हिहु प्रस्न मनहुँ अति मूढ़ा।। तात सुनहु सादर मनु लाई। कहउँ राम कै कथा सुहाई।। महामोहु महिषेसु बिसाला। रामकथा कालिका कराला।। रामकथा ससि किरन समाना। संत चकोर करहिं जेहि पाना।। ऐसेइ संसय कीन्ह भवानी। महादेव तब कहा बखानी।।

दोहा/सोरठा

कहउँ सो मति अनुहारि अब उमा संभु संबाद। भयउ समय जेहि हेतु जेहि सुनु मुनि मिटिहि बिषाद।।47।।

Section 49
चौपाई

एक बार त्रेता जुग माहीं। संभु गए कुंभज रिषि पाहीं।। संग सती जगजननि भवानी। पूजे रिषि अखिलेस्वर जानी।। रामकथा मुनीबर्ज बखानी। सुनी महेस परम सुखु मानी।। रिषि पूछी हरिभगति सुहाई। कही संभु अधिकारी पाई।। कहत सुनत रघुपति गुन गाथा। कछु दिन तहाँ रहे गिरिनाथा।। मुनि सन बिदा मागि त्रिपुरारी। चले भवन सँग दच्छकुमारी।। तेहि अवसर भंजन महिभारा। हरि रघुबंस लीन्ह अवतारा।। पिता बचन तजि राजु उदासी। दंडक बन बिचरत अबिनासी।।

दोहा/सोरठा

ह्दयँ बिचारत जात हर केहि बिधि दरसनु होइ। गुप्त रुप अवतरेउ प्रभु गएँ जान सबु कोइ।।48(क)।। संकर उर अति छोभु सती न जानहिं मरमु सोइ।। तुलसी दरसन लोभु मन डरु लोचन लालची।।48(ख)।।

Section 50
चौपाई

रावन मरन मनुज कर जाचा। प्रभु बिधि बचनु कीन्ह चह साचा।। जौं नहिं जाउँ रहइ पछितावा। करत बिचारु न बनत बनावा।। एहि बिधि भए सोचबस ईसा। तेहि समय जाइ दससीसा।। लीन्ह नीच मारीचहि संगा। भयउ तुरत सोइ कपट कुरंगा।। करि छलु मूढ़ हरी बैदेही। प्रभु प्रभाउ तस बिदित न तेही।। मृग बधि बन्धु सहित हरि आए। आश्रमु देखि नयन जल छाए।। बिरह बिकल नर इव रघुराई। खोजत बिपिन फिरत दोउ भाई।। कबहूँ जोग बियोग न जाकें। देखा प्रगट बिरह दुख ताकें।।

दोहा/सोरठा

अति विचित्र रघुपति चरित जानहिं परम सुजान। जे मतिमंद बिमोह बस हृदयँ धरहिं कछु आन।।49।।

← PrevNext →