बाल काण्ड — Sections 51–60
संभु समय तेहि रामहि देखा। उपजा हियँ अति हरपु बिसेषा।। भरि लोचन छबिसिंधु निहारी। कुसमय जानिन कीन्हि चिन्हारी।। जय सच्चिदानंद जग पावन। अस कहि चलेउ मनोज नसावन।। चले जात सिव सती समेता। पुनि पुनि पुलकत कृपानिकेता।। सतीं सो दसा संभु कै देखी। उर उपजा संदेहु बिसेषी।। संकरु जगतबंद्य जगदीसा। सुर नर मुनि सब नावत सीसा।। तिन्ह नृपसुतहि नह परनामा। कहि सच्चिदानंद परधमा।। भए मगन छबि तासु बिलोकी। अजहुँ प्रीति उर रहति न रोकी।।
ब्रह्म जो व्यापक बिरज अज अकल अनीह अभेद। सो कि देह धरि होइ नर जाहि न जानत वेद।। 50।।
बिष्नु जो सुर हित नरतनु धारी। सोउ सर्बग्य जथा त्रिपुरारी।। खोजइ सो कि अग्य इव नारी। ग्यानधाम श्रीपति असुरारी।। संभुगिरा पुनि मृषा न होई। सिव सर्बग्य जान सबु कोई।। अस संसय मन भयउ अपारा। होई न हृदयँ प्रबोध प्रचारा।। जद्यपि प्रगट न कहेउ भवानी। हर अंतरजामी सब जानी।। सुनहि सती तव नारि सुभाऊ। संसय अस न धरिअ उर काऊ।। जासु कथा कुभंज रिषि गाई। भगति जासु मैं मुनिहि सुनाई।। सोउ मम इष्टदेव रघुबीरा। सेवत जाहि सदा मुनि धीरा।।
मुनि धीर जोगी सिद्ध संतत बिमल मन जेहि ध्यावहीं। कहि नेति निगम पुरान आगम जासु कीरति गावहीं।। सोइ रामु ब्यापक ब्रह्म भुवन निकाय पति माया धनी। अवतरेउ अपने भगत हित निजतंत्र नित रघुकुलमनि।।
लाग न उर उपदेसु जदपि कहेउ सिवँ बार बहु। बोले बिहसि महेसु हरिमाया बलु जानि जियँ।।51।।
जौं तुम्हरें मन अति संदेहू। तौ किन जाइ परीछा लेहू।। तब लगि बैठ अहउँ बटछाहिं। जब लगि तुम्ह ऐहहु मोहि पाही।। जैसें जाइ मोह भ्रम भारी। करेहु सो जतनु बिबेक बिचारी।। चलीं सती सिव आयसु पाई। करहिं बिचारु करौं का भाई।। इहाँ संभु अस मन अनुमाना। दच्छसुता कहुँ नहिं कल्याना।। मोरेहु कहें न संसय जाहीं। बिधी बिपरीत भलाई नाहीं।। होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा।। अस कहि लगे जपन हरिनामा। गई सती जहँ प्रभु सुखधामा।।
पुनि पुनि हृदयँ विचारु करि धरि सीता कर रुप। आगें होइ चलि पंथ तेहि जेहिं आवत नरभूप।।52।।
लछिमन दीख उमाकृत बेषा चकित भए भ्रम हृदयँ बिसेषा।। कहि न सकत कछु अति गंभीरा। प्रभु प्रभाउ जानत मतिधीरा।। सती कपटु जानेउ सुरस्वामी। सबदरसी सब अंतरजामी।। सुमिरत जाहि मिटइ अग्याना। सोइ सरबग्य रामु भगवाना।। सती कीन्ह चह तहँहुँ दुराऊ। देखहु नारि सुभाव प्रभाऊ।। निज माया बलु हृदयँ बखानी। बोले बिहसि रामु मृदु बानी।। जोरि पानि प्रभु कीन्ह प्रनामू। पिता समेत लीन्ह निज नामू।। कहेउ बहोरि कहाँ बृषकेतू। बिपिन अकेलि फिरहु केहि हेतू।।
राम बचन मृदु गूढ़ सुनि उपजा अति संकोचु। सती सभीत महेस पहिं चलीं हृदयँ बड़ सोचु।।53।।
मैं संकर कर कहा न माना। निज अग्यानु राम पर आना।। जाइ उतरु अब देहउँ काहा। उर उपजा अति दारुन दाहा।। जाना राम सतीं दुखु पावा। निज प्रभाउ कछु प्रगटि जनावा।। सतीं दीख कौतुकु मग जाता। आगें रामु सहित श्री भ्राता।। फिरि चितवा पाछें प्रभु देखा। सहित बंधु सिय सुंदर वेषा।। जहँ चितवहिं तहँ प्रभु आसीना। सेवहिं सिद्ध मुनीस प्रबीना।। देखे सिव बिधि बिष्नु अनेका। अमित प्रभाउ एक तें एका।। बंदत चरन करत प्रभु सेवा। बिबिध बेष देखे सब देवा।।
सती बिधात्री इंदिरा देखीं अमित अनूप। जेहिं जेहिं बेष अजादि सुर तेहि तेहि तन अनुरूप।।54।।
देखे जहँ तहँ रघुपति जेते। सक्तिन्ह सहित सकल सुर तेते।। जीव चराचर जो संसारा। देखे सकल अनेक प्रकारा।। पूजहिं प्रभुहि देव बहु बेषा। राम रूप दूसर नहिं देखा।। अवलोके रघुपति बहुतेरे। सीता सहित न बेष घनेरे।। सोइ रघुबर सोइ लछिमनु सीता। देखि सती अति भई सभीता।। हृदय कंप तन सुधि कछु नाहीं। नयन मूदि बैठीं मग माहीं।। बहुरि बिलोकेउ नयन उघारी। कछु न दीख तहँ दच्छकुमारी।। पुनि पुनि नाइ राम पद सीसा। चलीं तहाँ जहँ रहे गिरीसा।।
गई समीप महेस तब हँसि पूछी कुसलात। लीन्ही परीछा कवन बिधि कहहु सत्य सब बात।।55।।
सतीं समुझि रघुबीर प्रभाऊ। भय बस सिव सन कीन्ह दुराऊ।। कछु न परीछा लीन्हि गोसाई। कीन्ह प्रनामु तुम्हारिहि नाई।। जो तुम्ह कहा सो मृषा न होई। मोरें मन प्रतीति अति सोई।। तब संकर देखेउ धरि ध्याना। सतीं जो कीन्ह चरित सब जाना।। बहुरि राममायहि सिरु नावा। प्रेरि सतिहि जेहिं झूँठ कहावा।। हरि इच्छा भावी बलवाना। हृदयँ बिचारत संभु सुजाना।। सतीं कीन्ह सीता कर बेषा। सिव उर भयउ बिषाद बिसेषा।। जौं अब करउँ सती सन प्रीती। मिटइ भगति पथु होइ अनीती।।
परम पुनीत न जाइ तजि किएँ प्रेम बड़ पापु। प्रगटि न कहत महेसु कछु हृदयँ अधिक संतापु।।56।।
तब संकर प्रभु पद सिरु नावा। सुमिरत रामु हृदयँ अस आवा।। एहिं तन सतिहि भेट मोहि नाहीं। सिव संकल्पु कीन्ह मन माहीं।। अस बिचारि संकरु मतिधीरा। चले भवन सुमिरत रघुबीरा।। चलत गगन भै गिरा सुहाई। जय महेस भलि भगति दृढ़ाई।। अस पन तुम्ह बिनु करइ को आना। रामभगत समरथ भगवाना।। सुनि नभगिरा सती उर सोचा। पूछा सिवहि समेत सकोचा।। कीन्ह कवन पन कहहु कृपाला। सत्यधाम प्रभु दीनदयाला।। जदपि सतीं पूछा बहु भाँती। तदपि न कहेउ त्रिपुर आराती।।
सतीं हृदय अनुमान किय सबु जानेउ सर्बग्य। कीन्ह कपटु मैं संभु सन नारि सहज जड़ अग्य।।57क।। जलु पय सरिस बिकाइ देखहु प्रीति कि रीति भलि। बिलग होइ रसु जाइ कपट खटाई परत पुनि।।57ख।।
हृदयँ सोचु समुझत निज करनी। चिंता अमित जाइ नहि बरनी।। कृपासिंधु सिव परम अगाधा। प्रगट न कहेउ मोर अपराधा।। संकर रुख अवलोकि भवानी। प्रभु मोहि तजेउ हृदयँ अकुलानी।। निज अघ समुझि न कछु कहि जाई। तपइ अवाँ इव उर अधिकाई।। सतिहि ससोच जानि बृषकेतू। कहीं कथा सुंदर सुख हेतू।। बरनत पंथ बिबिध इतिहासा। बिस्वनाथ पहुँचे कैलासा।। तहँ पुनि संभु समुझि पन आपन। बैठे बट तर करि कमलासन।। संकर सहज सरुप सम्हारा। लागि समाधि अखंड अपारा।।
सती बसहि कैलास तब अधिक सोचु मन माहिं। मरमु न कोऊ जान कछु जुग सम दिवस सिराहिं।।58।।
नित नव सोचु सतीं उर भारा। कब जैहउँ दुख सागर पारा।। मैं जो कीन्ह रघुपति अपमाना। पुनिपति बचनु मृषा करि जाना।। सो फलु मोहि बिधाताँ दीन्हा। जो कछु उचित रहा सोइ कीन्हा।। अब बिधि अस बूझिअ नहि तोही। संकर बिमुख जिआवसि मोही।। कहि न जाई कछु हृदय गलानी। मन महुँ रामाहि सुमिर सयानी।। जौ प्रभु दीनदयालु कहावा। आरती हरन बेद जसु गावा।। तौ मैं बिनय करउँ कर जोरी। छूटउ बेगि देह यह मोरी।। जौं मोरे सिव चरन सनेहू। मन क्रम बचन सत्य ब्रतु एहू।।
तौ सबदरसी सुनिअ प्रभु करउ सो बेगि उपाइ। होइ मरनु जेही बिनहिं श्रम दुसह बिपत्ति बिहाइ।।59।।