Bala Kanda

बाल काण्ड — Sections 6170

Section 61
चौपाई

एहि बिधि दुखित प्रजेसकुमारी। अकथनीय दारुन दुखु भारी।। बीतें संबत सहस सतासी। तजी समाधि संभु अबिनासी।। राम नाम सिव सुमिरन लागे। जानेउ सतीं जगतपति जागे।। जाइ संभु पद बंदनु कीन्ही। सनमुख संकर आसनु दीन्हा।। लगे कहन हरिकथा रसाला। दच्छ प्रजेस भए तेहि काला।। देखा बिधि बिचारि सब लायक। दच्छहि कीन्ह प्रजापति नायक।। बड़ अधिकार दच्छ जब पावा। अति अभिमानु हृदयँ तब आवा।। नहिं कोउ अस जनमा जग माहीं। प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं।।

दोहा/सोरठा

दच्छ लिए मुनि बोलि सब करन लगे बड़ जाग। नेवते सादर सकल सुर जे पावत मख भाग।।60।।

Section 62
चौपाई

किंनर नाग सिद्ध गंधर्बा। बधुन्ह समेत चले सुर सर्बा।। बिष्नु बिरंचि महेसु बिहाई। चले सकल सुर जान बनाई।। सतीं बिलोके ब्योम बिमाना। जात चले सुंदर बिधि नाना।। सुर सुंदरी करहिं कल गाना। सुनत श्रवन छूटहिं मुनि ध्याना।। पूछेउ तब सिवँ कहेउ बखानी। पिता जग्य सुनि कछु हरषानी।। जौं महेसु मोहि आयसु देहीं। कुछ दिन जाइ रहौं मिस एहीं।। पति परित्याग हृदय दुखु भारी। कहइ न निज अपराध बिचारी।। बोली सती मनोहर बानी। भय संकोच प्रेम रस सानी।।

दोहा/सोरठा

पिता भवन उत्सव परम जौं प्रभु आयसु होइ। तौ मै जाउँ कृपायतन सादर देखन सोइ।।61।।

Section 63
चौपाई

कहेहु नीक मोरेहुँ मन भावा। यह अनुचित नहिं नेवत पठावा।। दच्छ सकल निज सुता बोलाई। हमरें बयर तुम्हउ बिसराई।। ब्रह्मसभाँ हम सन दुखु माना। तेहि तें अजहुँ करहिं अपमाना।। जौं बिनु बोलें जाहु भवानी। रहइ न सीलु सनेहु न कानी।। जदपि मित्र प्रभु पितु गुर गेहा। जाइअ बिनु बोलेहुँ न सँदेहा।। तदपि बिरोध मान जहँ कोई। तहाँ गएँ कल्यानु न होई।। भाँति अनेक संभु समुझावा। भावी बस न ग्यानु उर आवा।। कह प्रभु जाहु जो बिनहिं बोलाएँ। नहिं भलि बात हमारे भाएँ।।

दोहा/सोरठा

कहि देखा हर जतन बहु रहइ न दच्छकुमारि। दिए मुख्य गन संग तब बिदा कीन्ह त्रिपुरारि।।62।।

Section 64
चौपाई

पिता भवन जब गई भवानी। दच्छ त्रास काहुँ न सनमानी।। सादर भलेहिं मिली एक माता। भगिनीं मिलीं बहुत मुसुकाता।। दच्छ न कछु पूछी कुसलाता। सतिहि बिलोकि जरे सब गाता।। सतीं जाइ देखेउ तब जागा। कतहुँ न दीख संभु कर भागा।। तब चित चढ़ेउ जो संकर कहेऊ। प्रभु अपमानु समुझि उर दहेऊ।। पाछिल दुखु न हृदयँ अस ब्यापा। जस यह भयउ महा परितापा।। जद्यपि जग दारुन दुख नाना। सब तें कठिन जाति अवमाना।। समुझि सो सतिहि भयउ अति क्रोधा। बहु बिधि जननीं कीन्ह प्रबोधा।।

दोहा/सोरठा

सिव अपमानु न जाइ सहि हृदयँ न होइ प्रबोध। सकल सभहि हठि हटकि तब बोलीं बचन सक्रोध।।63।।

Section 65
चौपाई

सुनहु सभासद सकल मुनिंदा। कही सुनी जिन्ह संकर निंदा।। सो फलु तुरत लहब सब काहूँ। भली भाँति पछिताब पिताहूँ।। संत संभु श्रीपति अपबादा। सुनिअ जहाँ तहँ असि मरजादा।। काटिअ तासु जीभ जो बसाई। श्रवन मूदि न त चलिअ पराई।। जगदातमा महेसु पुरारी। जगत जनक सब के हितकारी।। पिता मंदमति निंदत तेही। दच्छ सुक्र संभव यह देही।। तजिहउँ तुरत देह तेहि हेतू। उर धरि चंद्रमौलि बृषकेतू।। अस कहि जोग अगिनि तनु जारा। भयउ सकल मख हाहाकारा।।

दोहा/सोरठा

सती मरनु सुनि संभु गन लगे करन मख खीस। जग्य बिधंस बिलोकि भृगु रच्छा कीन्हि मुनीस।।64।।

Section 66
चौपाई

समाचार सब संकर पाए। बीरभद्रु करि कोप पठाए।। जग्य बिधंस जाइ तिन्ह कीन्हा। सकल सुरन्ह बिधिवत फलु दीन्हा।। भे जगबिदित दच्छ गति सोई। जसि कछु संभु बिमुख कै होई।। यह इतिहास सकल जग जानी। ताते मैं संछेप बखानी।। सतीं मरत हरि सन बरु मागा। जनम जनम सिव पद अनुरागा।। तेहि कारन हिमगिरि गृह जाई। जनमीं पारबती तनु पाई।। जब तें उमा सैल गृह जाईं। सकल सिद्धि संपति तहँ छाई।। जहँ तहँ मुनिन्ह सुआश्रम कीन्हे। उचित बास हिम भूधर दीन्हे।।

दोहा/सोरठा

सदा सुमन फल सहित सब द्रुम नव नाना जाति। प्रगटीं सुंदर सैल पर मनि आकर बहु भाँति।।65।।

Section 67
चौपाई

सरिता सब पुनित जलु बहहीं। खग मृग मधुप सुखी सब रहहीं।। सहज बयरु सब जीवन्ह त्यागा। गिरि पर सकल करहिं अनुरागा।। सोह सैल गिरिजा गृह आएँ। जिमि जनु रामभगति के पाएँ।। नित नूतन मंगल गृह तासू। ब्रह्मादिक गावहिं जसु जासू।। नारद समाचार सब पाए। कौतुकहीं गिरि गेह सिधाए।। सैलराज बड़ आदर कीन्हा। पद पखारि बर आसनु दीन्हा।। नारि सहित मुनि पद सिरु नावा। चरन सलिल सबु भवनु सिंचावा।। निज सौभाग्य बहुत गिरि बरना। सुता बोलि मेली मुनि चरना।।

दोहा/सोरठा

त्रिकालग्य सर्बग्य तुम्ह गति सर्बत्र तुम्हारि।। कहहु सुता के दोष गुन मुनिबर हृदयँ बिचारि।।66।।

Section 68
चौपाई

कह मुनि बिहसि गूढ़ मृदु बानी। सुता तुम्हारि सकल गुन खानी।। सुंदर सहज सुसील सयानी। नाम उमा अंबिका भवानी।। सब लच्छन संपन्न कुमारी। होइहि संतत पियहि पिआरी।। सदा अचल एहि कर अहिवाता। एहि तें जसु पैहहिं पितु माता।। होइहि पूज्य सकल जग माहीं। एहि सेवत कछु दुर्लभ नाहीं।। एहि कर नामु सुमिरि संसारा। त्रिय चढ़हहिं पतिब्रत असिधारा।। सैल सुलच्छन सुता तुम्हारी। सुनहु जे अब अवगुन दुइ चारी।। अगुन अमान मातु पितु हीना। उदासीन सब संसय छीना।।

दोहा/सोरठा

जोगी जटिल अकाम मन नगन अमंगल बेष।। अस स्वामी एहि कहँ मिलिहि परी हस्त असि रेख।।67।।

Section 69
चौपाई

सुनि मुनि गिरा सत्य जियँ जानी। दुख दंपतिहि उमा हरषानी।। नारदहुँ यह भेदु न जाना। दसा एक समुझब बिलगाना।। सकल सखीं गिरिजा गिरि मैना। पुलक सरीर भरे जल नैना।। होइ न मृषा देवरिषि भाषा। उमा सो बचनु हृदयँ धरि राखा।। उपजेउ सिव पद कमल सनेहू। मिलन कठिन मन भा संदेहू।। जानि कुअवसरु प्रीति दुराई। सखी उछँग बैठी पुनि जाई।। झूठि न होइ देवरिषि बानी। सोचहि दंपति सखीं सयानी।। उर धरि धीर कहइ गिरिराऊ। कहहु नाथ का करिअ उपाऊ।।

दोहा/सोरठा

कह मुनीस हिमवंत सुनु जो बिधि लिखा लिलार। देव दनुज नर नाग मुनि कोउ न मेटनिहार।।68।।

Section 70
चौपाई

तदपि एक मैं कहउँ उपाई। होइ करै जौं दैउ सहाई।। जस बरु मैं बरनेउँ तुम्ह पाहीं। मिलहि उमहि तस संसय नाहीं।। जे जे बर के दोष बखाने। ते सब सिव पहि मैं अनुमाने।। जौं बिबाहु संकर सन होई। दोषउ गुन सम कह सबु कोई।। जौं अहि सेज सयन हरि करहीं। बुध कछु तिन्ह कर दोषु न धरहीं।। भानु कृसानु सर्ब रस खाहीं। तिन्ह कहँ मंद कहत कोउ नाहीं।। सुभ अरु असुभ सलिल सब बहई। सुरसरि कोउ अपुनीत न कहई।। समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाई। रबि पावक सुरसरि की नाई।।

दोहा/सोरठा

जौं अस हिसिषा करहिं नर जड़ि बिबेक अभिमान। परहिं कलप भरि नरक महुँ जीव कि ईस समान।।69।।

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