मन प्रबोध

विनय तथा भक्ति · 8 padas

सब तजि भजिऐ नंद कुमार । और भजै तैं काम सरै नहिं, मिटै न भव जंजार । जिहिं जिहिं जोनि जन्म धार्‌यौ, बहु जोर्‌यौ अघ कौ भार । जिहिं काटन कौं समरथ हरि कौ तीछन नाम-कुठार । बेद, पुरान, भागवत, गीता, सब कौ यह मत सार । भव समुद्र हरि-पद-नौका बिनु कोउ न उतारै पार । यह जिय जानि, इहीं छिन भजि, दिन बीते जात असार । सूर पाइ यह समौ लाहु लहि, दुर्लभ फिरि संसार ॥1॥

Pada 1

जा दिन मन पंछी उड़ि जैहै । ता दिन तेरे तन-तरुवर के सबै पात झरि जैहैं । या देही कौ गरब न करियै, स्यार-काग-गिध खैहैं । तीननि में तन कृमि, कै विष्टा, कह्वै खाक उड़ैहै । कहँ वह नीर, कहाँ वह सोभा कहँ रँग-रूप दिखैहै । जिन लोगनि सौं नेह करत है, तेई देखि घिनैहैं । घर के कहत सबारे काढ़ौ, भूत होइ धर खैहैं । जिन पुत्रनिहिं बहुत प्रतिपाल्यौ, देवी-देव मनैहैं । तेई लै खोपरी बाँस दै, सीस फोरि बिखरैहैं ! अजहूँ मूढ़ करौ सतसंगति, संतनि मैं कछु पैहै । नर-बपु धारि नाहिं जन हरि कौं, जम की मार सो खैहै । सूरदास भगवंत-भजन बिनु बृथा सु जनम गँवैहै ॥2॥

Pada 2

तिहारौ कृष्न कहत कह जातृ ? बिछुरैं मिलन बहुरि कब ह्वै है, ज्यों तरवर के पात । सीत-बात-कफ कंठ बिरौधै, रसना टूटै बात । प्रान लए जम जात, मूढ़-मति देखत जननी-तात । छन इक माहिं कोटि जुग बीतत, नर की केतिक बात । यह जग-प्रीति सुवा-सेमर ज्यों, चाखत ही उड़ि जात । जमकैं फंद पर्‌यौ नहिं जब लगि, चरननि किन लपटात ? कहत सूर बिरथा यह देही, एतौ कत इतरात ॥3॥

Pada 3

मन, तोसों किती कही समुझाइ । नंदनँदन के, चरन कमल भजि तजि पाखँड-चतुराइ । सुख-संपति, दारा-सुत, हय-गय, छूट सबै समुदाइ । छनभंगुर यह सबै स्याम बिनु, अंत नाहिं सँग जाइ । जनम-मरत बहुत जुग बीते, अजहुँ लाज न आइ । सूरदास भगवंत-भजन बिनु जैहै जनम गँवाइ ॥4॥

Pada 4

धोखैं ही धोखै डहकायौ समुझि न परी, विषय-रस गीध्यौ; हरि-हीरा घर माँझ गँवायौ । ज्यों कुरंग जल देखि अवनि कौ, प्यास न गई चहूँ दिसि धायौ । जनम-जनम बह करम किए हैं, तिनमैं आपुन आपु बँधायो । ज्यौं सुक सेमर सेव आस लगि, निसि-बासर हठि चित्त लगायौ । रीतौ पर्‌यौ जबै फल चाख्यौ,उड़ि गयौ तूल, ताँवरौ आयौ । ज्यौं कपि डोर बाँधि बाजीगर, कन-कन कौं चौहटैं नचायौ । सूरदास भगवंत-भजन बिनु, काल-व्याल पै आपु डसायौ ॥5॥

Pada 5

भक्ति कबन करिहौ, जनम सिरानौ । बालापन खेलतहीं खोयो, तरुनाई गरबानौ । बहुत प्रपंच किए माया के, तऊ न अधम अघानौ । जतन जतन करि माया जोरी, लै गयौ रंक न रानौ । सुत-वित-बनिता-प्रीति लगाई, झूठे भरम भुलानौ । लोभ-मोह तें चेत्यौ नाहीं, सुपने ज्यौं डहकानौ । बिरध भऐं कफ कंठ बिरौध्यौ, सिर धुनि-धुनि पछितानौ । सूरदास भगवंत-भजन-बिनु, जम कैं हाथ बिकानौ ॥6॥

Pada 6

तजौ मन हरि, बिमुखनि कौ संग । जिनकैं संग कुमति उपजति है, परत भजन में भंग । कहा होत पय पान कराऐँ, विष नहिं तजत भुजंग । कागहिं कहा कपूर चुगाऐं, स्वान न्हावाऐं गंग । खर कौं कहा अरगजा-लेपन, मरकट भूषन-अंग । गज कौं कहा सरित अन्हवाऐं, बहुरि धरै वह ढंग । पाहन पतित बान नहिं बेधत, रीतौ करत निषंग । सूरदास कारी कामरि पै, चढ़त न दूजी रंग ॥7॥

Pada 7

रे मन मूरख जनम गँवायौ । करि अभिमान वुषय-रस गीध्यौ, स्याम-सरन नहिं आयौ । यह संसार सुवा-सेमर ज्यौं, सुन्दर देखि लुभायौ । चाखन लाग्यौ रुई गई उड़ि हाथ कहिं आयौ । कहा होत अब के पछिताऐँ पहिलैं पाप कमायौ । कहत सूर भगवंत-भजन बिनु, सिर धुनि-धुनि पछितायौ ॥8॥

Pada 8

वैराग्यचित्-बुद्धि-संवाद