वैराग्य

विनय तथा भक्ति · 6 padas

किते दिन हरि-सुमिरन बिनु खोए । परनिंदा रसना के रस करि, केतिक जनम बिगोए । तेल लगाइ कियौ रुचि मर्दन, बस्तर मलि-मलि धोए । तिलक बनाई चले स्वामी ह्वै, विषयिनि के मुख जोए । काल बली तैं सब जग काँप्यौ, ब्रह्मादिक हूँ रोए । सूर अधम की कहौ कौन गति, उदर भरे, परि सोए ॥1॥

Pada 1

नर तैं जनम पाइ कह कीनो ? उदर भरयौ कूकर सूकर लौं, प्रभु कौ नाम न लीनौ । श्री भागवत सुनी नहिं श्रवननि, गुरु गोबिंद नहिं चीनौ । भाव-भक्ति कछु हृदय न उपजी, मन विषया मैं दीनौ । झूठौ सुभ अपनौ करि जान्यौ, परस प्रिया कैं भीनी । अघ कौ मेरु बढ़ाइ अधम तू, अंत भयौ बलहीनौ । लख चौरासी जोनि भरमि कै फिरि वाहीं मन दीनौ । सूरदास भगवंत-भजन बिनु ज्यौ अंजलि-जल छीनौ ॥2॥

Pada 2

इत-उत देखत जनम गयौ । या झूठी माया कैं कारन, दुहुँ दृग अंध भयौ । जनम-कष्ट तैं मातु दुखित भई, अति दुख प्रान सह्यो । वै त्रिभुवनपति बिसरि गए तोहिं, सुमिरत क्यों न रह्यो । श्रीभागवत सुन्यौ नहिं कबहूँ, बीचहिं भटकि मर्‌यौ । सूरदास कहै, सब जग बूड़्यौ, जुग-जुग भक्त तर्यौ ॥3॥

Pada 3

सबै दिन गए विषय के हेत । तीनौं पन ऐसौं हीं खोए, केस भए सिर सेत । आँखिनि अंध, स्रवन नहिं सुनियत, थाके चरन समेत । गंगा-जल तजि पियत कूप-जल, हरि पूजत प्रेत । मन-बच-क्रम जौ भजै स्याम कौं, चारि पदारथ देत । ऐसी प्रभू छाँड़ि क्यों भटकै, अजहूँ चेति अचेत । रामनाम बिनु क्यों छूटौगै, कंद गहैं ज्यौं केत । सूरदास कछु खरच न लागत , राम नाम मुख लेत ॥4॥

Pada 4

द्वै मैं एकौ तौ न भई । ना हरि भज्यौ, न गृह सुख पायौ, बृथा बिहाइ गई । ठानी हुती और कछु मन मैं, औरे आनि ठई । अबिगत-गति कछु समुझि परत नहिं जो कछु करत दई । सुत सनेहि-तिय सकल कुटुँब मिलि, निसि-दिन होत खई । पद-नख-चंद चकोर बिमुख मन, खात अँगार मई । विषय-विकार-दावानल उपजी, मोह-बयारि लई । भ्रमत-भ्रमत बहुतै दुख पायौ, अजहुँ न टेंव गई । होत कहा अबके पछिताएँ, बहुत बेर बितई । सूरदास सेये न कृपानिधि, जो सुख सकल मई ॥5॥

Pada 5

अब मैं जानी देह बुढ़ानी । सीस, पाउँ, कर कह्यौ न मानत, तन की दसा सिरानी । आन कहत, आनै कहि आवत, नैन-नाक बहै पानी । मिटि गई चमक-दमक अँग-अँग की, मति अरु दृष्टि हिरानी । नाहिं रही कछु सुधि तन-मन की, भई जु बात बिरानी । सूरदास अब होत बिगूचनि, भजि लै सारँगपानी ॥6॥

Pada 6

भावीमन प्रबोध