बिनती सुनौ दीन की चित्त दै, कैसें तुव गुन गावै ? माय नटी लकुटी कर लीन्हें कोटिक नाच नचावै । दर-दर लोभ लागि लिये डोलति, नाना स्वाँग बनावै । तुम सौं कपट करावति प्रभु जू, मेरी बुधि भरमावै । मन अभिलाश-तरंगनि करि करि, मिथ्या विसा जगावै । सोवत सपने मैं ज्यौं संपति, त्यौ दिखाइ बौरावै । महा मोहनी मोहि आतमा, अपमारगहिं लगावै । ज्यौं दूती पर-बधू भोरि कै, लै पर-पुरुष दिखावै । मेरे तो तुम पति , तुमहिं गति, तुम समान को पावै ? सूरदास प्रभु तुम्हरी कृपा बिनु, को मो दुख बिसरावै ॥1॥
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