अविद्या-माया

विनय तथा भक्ति · 2 padas

बिनती सुनौ दीन की चित्त दै, कैसें तुव गुन गावै ? माय नटी लकुटी कर लीन्हें कोटिक नाच नचावै । दर-दर लोभ लागि लिये डोलति, नाना स्वाँग बनावै । तुम सौं कपट करावति प्रभु जू, मेरी बुधि भरमावै । मन अभिलाश-तरंगनि करि करि, मिथ्या विसा जगावै । सोवत सपने मैं ज्यौं संपति, त्यौ दिखाइ बौरावै । महा मोहनी मोहि आतमा, अपमारगहिं लगावै । ज्यौं दूती पर-बधू भोरि कै, लै पर-पुरुष दिखावै । मेरे तो तुम पति , तुमहिं गति, तुम समान को पावै ? सूरदास प्रभु तुम्हरी कृपा बिनु, को मो दुख बिसरावै ॥1॥

Pada 1

हरि, तेरो भजन कियौ न जाइ । कह करौं, तेरी प्रबल माया देति मन भरमाइ । जबै आवौं साधु-संगति, कछुक मन ठहराइ । ज्यौं गयंद अन्हाइ सरिता, बहुरि वहै सुभाइ । बेष धरि धरि हर्‌यौ पर-धन, साधु-साधु कहाइ । जैसे नटवा लोभ -कारन करत स्वाँग बनाइ । करौं जतन, न भजौं तुमकों, कछुक मन उपजाई । सूर प्रभु की सबल माया. देति मोहि भुलाइ ॥2॥

Pada 2

भक्त-वत्सलतागुरु महिमा