हमारे निर्धन के धन राम चोर न लेत, घटत नहिं कबहूँ, आवत गाढ़ैं काम । जल नहिं बूड़त अगिनि न दाहत, है ऐसौ हरि नाम । बैकुँठनाथ सकल सुख-दाता, सूरदास-सुख-धाम ॥1॥
Pada 1
विनय तथा भक्ति · 11 padas
हमारे निर्धन के धन राम चोर न लेत, घटत नहिं कबहूँ, आवत गाढ़ैं काम । जल नहिं बूड़त अगिनि न दाहत, है ऐसौ हरि नाम । बैकुँठनाथ सकल सुख-दाता, सूरदास-सुख-धाम ॥1॥
Pada 1
बड़ी है राम नाम की ओट । सरन गऐं प्रभु काढ़ि देत नहिं, करत कृपा कैं कोट । बैठत सबै सभा हरि जू की, कौन बड़ौ को छोट ? सूरदास पारस के परसैं मिटति लोह की खोट ॥2॥
Pada 2
जो सुख होत गुपालहिं गाऐँ । सो सुख होत न जप-तप कीन्हैं, कोटिक तीरथ न्हाऐँ । दिएँ लेत नहिं चारि पदारथ, चरन-कमल चित लाऐँ । तीनि लोक तृन-सम करि लेखत, नंद-नँदन उर आऐं । बंसीबट, बृंदावन, जमुना, तजि बैकुँठ न जावै । सूरदास हरि कौ सुमिरन करि, बहुरि न भव-जल-आवै ॥3॥
Pada 3
बंदों चरन-सरोज तिहारे । सुंदर स्याम कमल-दल-लोचन, ललित त्रिभंगी प्रान पियारे । जे पद-पदुम सदा सिव के धन, सिंधु-सुता उर तैं नहिं टारे । जे पद-पदुम तात-रिस-त्रासत, मनबच-क्रम प्रहलाद सँभारे । जे पद-पदुम-परस-जल-पावन सुरसरि-दरस कटत अब भारे । जे पद-पदम-परस रिषि-पतिनी बलि, नृग, व्याध, पतित बहु तारे । जे पद-पदुम रमत बृंदावन अहि-सिर धरि, अगनित रिपु मारे । जे पद-पदुम परसि ब्रज-भामिनि सरबस दै, सुत-सदन बिसारे । जे पद-पदुम रमत पांडव-दल दूत भए, सब काज सँवारे । सूरदास तेई पद-पंकज त्रिबिध-ताप-दुख-हरन हमारे ॥4॥
Pada 4
अब कैं राखि लेहु भगवान । हौं अनाथ बैठ्यौ द्रुम-डरिया, पारधि साधे बान । ताकैं डर मैं भाज्यौ चाहत, ऊपर ढुक्यौ सचान । दुहूँ भाँति दुख भयौ आनि यह, कौन उबारे प्रान ? सुमिरत ही अहि डस्यौ पारधी, कर छूट्यौ संधान । सूरदास सर लग्यौ सचानहिं, जय जय कृपानिधान ॥5॥
Pada 5
आछौ गात अकारथ गार्यौ । करीन प्रीति कमल-लोचन सौं, जनम जुवा ज्यौं हार्यौ । निसि दिन विषय-बिलासिन बिलसत, फूट गईं तब चार्यौ । अब लाग्यौ पछितान पाइ दुख, दीन दई कौ मार्यौ । कामी, कृपन;कुचील, कुडरसन, को न कृपा करि तार्यौ । तातैं कहत दयाल देव-मनि, काहैं सूर बिसार्यौ ॥6॥
Pada 6
तुम बिनु भूलोइ भूलौ डोलत । लालच लागिकोटि देवन के, फिरत कपाटनि खोलत । जब लगि सरबस दीजै उनकौं, तबहिं लगि यह प्रीति । फलमाँगत फिरि जात मुकर ह्वै यह देवन की रीति । एकनि कौं जिय-बलि दै पूजै, पूजत नैंकु न तूठे । तब पहिचानि सबनि कौं छाँड़े नख-सिख लौं सब झूठे । कंचन मनि तजि काँचहिं सैंतत, या माया के लीन्हे ! तुम कृतज्ञ, करुनामय, केसव, अखिल लोक के नायक । सूरदास हम दृढ़ करि पकरे, अब ये चरन सहायक ॥7॥
Pada 7
आजु हौं एक-एक करि टरिहौं । कै तुमहीं, कै हमहीं माधौ, अपने भरोसैं लरिहौं । हौं पतित सात पीढ़नि कौ, पतितै ह्वै निस्तरिहौं । अब हौं उघरि नच्यौ चाहत हौं, तुम्हैं बिरद बिन करिहौं । कत अपनी परतीति नसावत , मैं पायौ हरि हीरा । सूर पतित तबहीं उठहै, प्रभु जब हँसि दैहौ बीरा ॥8॥
Pada 8
प्रभु हौं सब पतितन कौ टीकौ । और पतित सब दिवस चारि के, हौं तौ जनमत ही कौ । बधिक अजामिल गनिका तारी और पूतना ही कौ । मोहिं छाँड़ि तुम और उधारे, मिटै सूल क्यौं जी कौ । कोऊ न समरथ अघ करिबे कौं, खैंचि कहत हौं लीको । मरियत लाज सूर पतितन में, मोहुँ तैं को नीकौ ! ॥9॥
Pada 9
अब मैं नाच्यौ बहुत गुपाल । काम-क्रोध कौ पहिरि चोलना, कंठ विषय की माल ॥ महामोह के नुपूर बाजत, निंदा-सब्द-रसाल । भ्रम-भोयौ मन भयौ पखावज, चलत असंगत चाल । तृष्ना नाद करति घट भीतर, नाना बिधि दै ताल । माया को कटि फेटा बाँध्यौ, लोभ-तिलक दियौ भाल । कोटिक कला काछि दिखराई जल-थल सुधि नहिं काल । सूरदास की सबै अविद्या दूरि करौ नँदलाल ॥10॥
Pada 10
हमारे प्रभु, औगुन चित न धरौ । समदरसी है नाम तुम्हारौ, सोई पार करौ । इक लोहा पूजा मैं राखत, इक घर बधिक परौ । सो दुबिधा पारस नहिं जानत, कंचन करत खरौ । इक नदिया इक नार कहावत, मैलौ नीर भरौ । जब मिलि गए तब एक बरन ह्वै. गंगा नाम परौ । तन माया, ज्यौं ब्रह्म कहावत, सूर सु मिलि बिगरौ ॥ कै इनकौ निरधार कीजियै, कै प्रन जात टरौ ॥11॥
Pada 11